धनबाद (DHANBAD) के कोहिनूर ग्राउंड में सोमवार से न्यू लहासा रिफ्यूजी मार्केट की शुरुआत हो गई है. न्यू लहासा मार्केट का उद्धाटन धनबाद के भाजपा विधायक राज सिन्हा ने फीता काटकर किया. इस दौरान कर्नाटक के मैसूर से आए दर्जनों रिफ्यूजी दुकानदार उपस्थित रहे. मौके पर उन्होंने The news post को बताया जाता है कि 1962 के समय से ही तिब्बत को चीन द्वारा हड़प लिए जाने के बाद हजारों तिब्बती शरणार्थी भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में शरण लिए हुए हैं. गर्म कपड़ों को बेचकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं. उसमें से 25 परिवार पिछले 25 साल से धनबाद के कोहिनूर ग्राउंड में प्रत्येक साल नवंबर के समय में अपनी लहासा मार्केट लगाते हैं. 3 माह तक धनबाद में रहकर गर्म कपड़ों का व्यापार करते हैं. फिर फरवरी-मार्च तक अपने पुनर्वासित घर वापस लौट जाते हैं.
तिब्बती भाइयों की मदद करें
इस अवसर पर धनबाद विधायक राज सिन्हा ने कहा कि हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि रिफ्यूजी (शरणार्थी) तिब्बती भाइयों की मदद करें और ज्यादा से ज्यादा कपड़ों की खरीदारी कर उनके परिवार के भरण-पोषण में सहयोग करें. उनके द्वारा तैयार किए गए कपड़े ना सिर्फ अच्छी क्वालिटी के हैं, बल्कि सस्ते भी है. धनबाद विधायक राज सिन्हा ने कोहिनूर मैदान का अस्तित्व को समाप्त किए जाने पर सवाल उठाया और कहा कि जिला प्रशासन ने कोहिनूर मैदान के एक हिस्से चुनाव से जुड़े बहुउपयोगी भवन व गोडाउन बना दिया है. तो दूसरी ओर नगर निगम बची खुची जमीन पर वेंडिंग जोन बनाने जा रही है. ऐसे में धनबाद के कोहिनूर ग्राउंड के आसपास रहने वाले बच्चों के खेलने के लिए कोई ग्राउंड तक उपलब्ध नहीं है या फिर आकस्मिक स्थिति में खुले मैदान नहीं रहेंगे. उन्होंने धनबाद के प्रशासनिक अधिकारियों की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि नीति बनाने से पहले वे लोग स्थानीय जनप्रतिनिधियों से राय मशविरा भी नहीं लेते. उन्होंने अपनी पूर्व की रघुवर सरकार में पदस्थापित अधिकारियों द्वारा तैयार की गई नीति पर भी सवाल उठाया.
धनबाद से लगाव
वहीं न्यू ल्हासा मार्केट के शरणार्थी दुकानदारों ने धनबाद के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि धनबाद के लोग उन्हें बहुत प्यार देते हैं और यही कारण है कि पिछले वर्ष 2020 में कोरोना को छोड़कर पिछले 25 साल से वे लोग लगातार धनबाद में व्यापार करने के लिए आते रहें है. झारखंड से उन्हें गहरा लगाव है. उनकी नई पीढ़ी या तो भारत में ही पली-बढ़ी हैं और पिछले 65-70 साल में निर्वाचित जिंदगी जीने के बावजूद उन्हें अपने वतन तिब्बत की बहुत याद आती है. वहीं शरण देने वाले देश भारत पर न सिर्फ गर्व है बल्कि भारत उनके दिलों में बसता है.
रिपोर्ट : अभिषेक कुमार सिंह, ब्यूरों चीफ, धनबाद
