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टुसू पर्व झारखंडी संस्कृति, परंपरा और लोक आस्था का प्रतीक, किसानों के जीवन से गहराई से जुड़ा है पर्व

BY -
Rajnish Sinha
Rajnish Sinha
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 7:11:54 AM

धनबाद : झारखण्डी संस्कृति डहरे टुसू पर्व धनबाद कोयलांचल के अलग-अलग क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया. काको कतरी नदी समीप और तोपचांची में डहरे टुसू उत्साह के साथ मनाया गया.

एक दिवसीय टुसू मेला

कांको स्थित कतरी नदी के तट पर शहीद मनिंद्र नाथ मंडल ग्रामीण ट्रस्ट के द्वारा एक दिवसीय टुसू मेला का आयोजन किया गया. इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोगों ने शहीद मनिंद्र नाथ मंडल को नमन करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

झारखंडी लोक गीतों पर झूमते नजर आए प्रतिभागी

वही तोपचांची प्रखंड में डहरे टुसू पर्व को लेकर खास उत्साह देखने को मिला. मानटांड मैदान से तोपचांची वाटर बोर्ड तक डहरे टुसू का भव्य आयोजन किया गया जिसमें सैकड़ों युवती एवं महिलाओं ने भाग लिया. इस दौरान प्रतिभागी झारखंडी लोक गीतों पर नाचते-गाते और पारंपरिक वेशभूषा में उत्सव का आनंद लेते नजर आए. डहरे टुसू जुलूस के माध्यम से श्रद्धालु विसर्जन के लिए तोपचांची झील पहुंचे.

नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ना उद्देश्य

काको टुसू पर्व आयोजक ने कहा कि मेला सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और सहेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उन्होंने कहा कि पहली बार टुसू मेला का आयोजन किया गया है जिससे ग्रामीण परंपराओं और लोक संस्कृति को बढ़ावा मिल सके. आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ना और पारंपरिक विरासत को जीवंत बनाए रखना है.

तोपचांची डहरे टुसू आयोजक जयंती देवी ने बताया कि टुसू पर्व की पूजा पूरे तीस दिनों तक की जाती है जिसमें प्रतिदिन फूल चढ़ाकर आस्था के साथ पूजा की जाती है. इसके बाद आज विधि-विधान से विसर्जन किया गया.

किसानों के जीवन से गहराई से जुड़ा है पर्व

उन्होंने कहा कि टुसू पर्व झारखंडी संस्कृति, परंपरा और लोक आस्था का प्रतीक है. झारखंडी लोक गीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता है. टुसू पर्व मुख्य रूप से खेती-बाड़ी के कार्य पूर्ण होने के बाद मनाया जाता है जो किसानों के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है.

रिपोर्ट : नीरज कुमार

Tags:DHANBADTUSUKOYLANCHALTOPCHACHIKAKOKATRI NADI

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