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महिलाओं के मांग धोने का क्या है रहस्य, पति के घर से निकलते ही महिलायें मान लेती हैं मृत, जानिए दलमा के सेंदरा पर्व का महत्व

BY -
Samir Hussain
Samir Hussain
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 1:02:16 PM

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): झारखंड प्राकृतिक और विभिन्न परंपराओं का राज्य है. जहां विभिन्न आदिवासी जनजाति के लोग निवास करते हैं. जिसमें मुख्य रुप से कोरवा, सबर, असुर, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरजिया, पहाड़िया, बिरहोर जाति के लोग शामिल है. इनकी पुरानी परंपरा अपने- आप में काफी अनोखा और प्रकृति पर आधारित है. आदिकाल से ही झारखंड के आदिवासी मूलवासी प्रकृति के प्रति अपने प्रेम को पर्व और परंपराओं के जरीए दर्शाते हैं. जिसमें सेंदरा यानी शिकार पर्व अपने आप में काफी अनोखा है.

सेंदरा पर्व अपने आप में है काफी अनोखा

जमशेदपुर के पूर्वी सिंहभूम स्थित सरायकेला-खरसावां के दलमा में रहनेवाले आदिवासी समुदाय के लोगों का सेंदरा पर्व अपने आप में काफी अनोखा है. जो शिकार पर्व के नाम से भी जाना जाता है. आज से हजारों साल पहले से चली आ रही पुरानी परंपरा को आदिवासी लोग काफी नियम धर्म के साथ पालन करते हैं. इनकी परंपरा को लेकर लगाव ही इनको सभी लोगों से अलग बनाता है.

सेंदरा पर्व विशेष रुप से शिकार करने पर आधारित एक पर्व है

सेंदरा पर्व विशेष रुप से शिकार करने पर आधारित एक पर्व है. जिसमें शिकार पर गये पुरुष की मृत्यु होने पर  उनको शहीद का दर्जा दिया जाता है. और एक शहीद की तरह सम्मानित किया जाया है. सेंदरा पर्व पर निकलने से पहले महिलायें अपने पतियों को सिंदूर और कंगन दे देती है. और अपने मांग के सिंदूर को धो देती है. जिसका ये मतलब होता है कि शिकार पर जा रहे उनके पति अब वापस नहीं आयेंगे. लेकिन जब उनके पति शिकार से जिंदा सही सलामत वापस आते हैं. तो अपनी पत्नी को फिर से सिंदूर लगाकर कंगन पहनाते हैं. शिकार पर्व के इस पर्व की परंपरा को आदिवासी लोग आज भी पूरे धूमधाम से मनाते हैं.

शिकारी की मौत को दिया जाता है शहीद का दर्जा

वहीं यदि इस शिकार पर्व में शिकार पर निकले 'सेंदरा वीर यानी शिकारी की मौत हो जाती है. तो उसे शहीद का दर्जा दिया जाता है. लेकिन 'सेंदरा वीर की लाश को दुबारा गांव में नहीं लाया जाता है. उनका अंतिम संस्कार गांव से दूर जंगल में ही कर दिया जाता है. दलमा के राजा राकेश हेंब्रम के अनुसार इस अनोखी परंपरा को आदि काल से आदिवासी जनजाति निभाते आ रहे हैं.

हर साल मई महीने के अलग- अलग तारीख को सेंदरा पर्व मनाया जाता है

हर साल मई महीने के अलग- अलग तारीख को सेंदरा पर्व मनाया जाता है. इसको मनाने को लेकर दलमा के राजा राकेश हेम्ब्रम के घर पर गांव के लोगों की बैठक की जाती है. जिसमें शिकार पर्व को मनाने की तिथि तय की जाती है. दलमा के राजा राकेश हेम्ब्रम की माने जब कोई योद्धा किसी लड़ाई में शामिल होने के लिए घर से निकलता है. तो उसके घर परिवार के लोग ये मानकर चलते हैं कि वो शहीद होने जा रहा है. जिसकी वजह से उनकी पत्नियां शिकार के लिए पति के निकलते ही अपना सिंदूर धो देती है.

सेंदरा पर्व पर शिकार पर जाने से पहले ही तेल-मसाला खाना रहता है बंद

आपको बताये कि दलमा के सेंदरा पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग दो दिन पहले से ही दलमा के फदलोगोड़ा या आसनबनी में रहने लगते हैं. जहां ये अपने आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना कर उनसे शिकार की सफलता की प्रार्थना करते हैं. जहां देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जानवरों की बलि चढ़ाते हैं. इनके घर से निकलते ही इनके घर के लोग तेल-मसालावाला खाना बंद कर देते हैं. दो दिनों तक परिवार के लोग साग भात, बासी भात ही खाते हैं. दो दिन बाद जब सेंदरा वीर घर वापस लौटते हैं. तो तेल मसालावाला खाना बनना शुरु हो जाता है.

साल 2023 में सेंदरा पर्व 1 मई को मनाया जायेगा 

साल 2023 में सेंदरा पर्व 1 मई को मनाया जायेगा. 30 अप्रैल को सेंदरा वीर दलमा पहाड़ पर चढ़ेगें. इस दौरान देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर सफलता की प्रार्थना की जायेगी. वहीं इस दौरान बलि देने की भी परंपरा है. जिस पर दलमा के राजा राकेश हेम्ब्रम ने लोगों से जंगल के नियमों के उल्लंघन ना करने की अपील की हैं.

रिपोर्ट- प्रियंका कुमारी

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