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झारखंड की राजनीति में मचा घमासान, सीएम और गवर्नर हुए आमने सामने, जानिए इस शह और मात की पूरी कहानी

BY -
Padma Sahay
Padma Sahay
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 11:33:57 PM

रांची(RANCHI): झारखंड में यदि कुछ स्थिर है तो वो है इसकी राजनीतिक अस्थिरता . यूं तो झारखंड की ये राजनीतिक हलचल  इसके निर्माण के पूर्व  से ही चली आ  रही  है परंतु तब और अब से जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है. तब झारखंड के लोग एकजुट होकर बाहरी अंग्रेज  के खिलाफ लड़ते थे अब झारखंड में  तमाम सियासी झगड़े आपस मे ही हो रहे है. जी हां झारखंड की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य का उत्सव राज्य का सम्मान राजनीतिक दलों के विवाद से बड़ा हो गया. शह और मात का खेल तो राजनीति में  चलता ही रहता है परंतु झारखंड मे जो हो रहा वो कुछ अलग ही कलेवर लिए है. बता दें की पिछले कई दिनों से हेमंत सोरेन सरकार पर ईडी और आईटी का दबाव बढ़ता ही जा रहा है. लगातार जेएमएम  के मंत्री नेताओं पर ईडी की रेड और आयकर की छापेमारी पिछले कई दिनों से जारी है. कोर्ट से भी हेमंत को राहत नही मिल रही जिस कारण सोरेन सरकार चौतरफा हमलों से घिरती दिख रही. हेमंत सरकार भी जवाबी कारवाई करते हुए विपक्ष से दो दो हाथ करने के मूड में आ गई है और आनन फानन रघुवर सरकार के पांच मंत्रियों पर आय से अधिक संपत्ति  की जांच के निर्देश दे दिए.

राज्यपाल बनाम सीएम, जानिए क्यों टकरा रहे रमेश बैस और हेमंत सोरेन  

शुरू से शुरू करें तो भाजपा ने सीएम हेमंत सोरेन पर स्टोन माइनिंग लीज अपने नाम करवाने के आरोप लगाए थे. पार्टी ने आरोप लगाया था कि कि हेमंत सोरेन ने सीएम पद का दुरुपयोग कर अपने नाम पर खदान आवंटित की है. तथा इस मामले मे राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा. जिसके बाद राज्यपाल ने इस मामले मे निर्वाचन आयोग से मन्तव्य मांगी और इसे सार्वजनिक नही किया तभी से  मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी. इसके बाद यूपीए और सीएम ने भी राजभवन पर हमला बोल दिया और इन सबके बीच मुखउमंत्री ने हाईकोर्ट में राज्यपाल रमेश बीस के खिलाफ याचिका दायर कर दी. जिससे मामला और भड़क गया .

टकराव में बदलता शीत युद्ध

इन दोनों के शीत युद्ध से कोई अनजान नहीं, एक ओर जहां  झारखंड स्थापना दिवस की धूम के बीच पूरे शहर मे लगे होर्डिंग व विज्ञापनों पर से राज्यपाल की तस्वीर गायब थी और न ही उनका नाम था. साथ ही राज्यपाल को राजभवन से समारोह स्थल तक लाने के लिए किसी भी अधिकारी की प्रतिनियुक्ति तक नही की गई थी. तो वही दूसरी ओर  इस बात को अपना अपमान मान कर  राज्यपाल की नाराजगी इतनी बढ़ गई कि उन्होंने स्वास्थ्य  संबंधी कारणों का हवाला देते हुए समारोह मे आने से इनकार कर दिया. बता दें कि झारखंड के इतिहास में  ऐसा पहली दफा हुआ कि  धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की समाधि स्थल पर राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल अलग अलग पहुंचे और दोनों के बीच के मौन समर की झलक साफ नजर आ गई .

जानिए अबतक क्या हुआ क्यों हेमंत सोरेन हैं नाराज

सरकार की बौखलाहट की वजह है भारत निर्वाचन आयोग का जो मंतव्य राज्यपाल के पास आया है, उसके बारे में राज्यपाल का उन्हे कुछ न बताना है . सरकार का कहना है कि हमे कुछ नहीं  बताया जा रहा. इससे राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है. निर्वाचन आयोग ने जो मंतव्य राज्यपाल को भेजा है, उसकी प्रति उन्हें मिलनी चाहिए. ऐसा नहीं होने से उनके  मौलिक अधिकारों का हनन तो हो ही रहा है, इससे नेचुरल जस्टिस के सिद्धांत का भी उल्लंघन होता है. इस बात को लेकर हेमंत सोरेन कोर्ट की शरण मे भी गए और मामले में राज्यपाल व भारत निर्वाचन आयोग को प्रतिवादी बनाया है. उल्लेखनीय है कि हेमंत सोरेन के अनगड़ा माइनिंग लीज आवंटन मामले में राज्यपाल से भाजपा की ओर से शिकायत की गयी थी. इसके बाद राज्यपाल ने संविधान की धारा-192(2) के तहत भारत निर्वाचन आयोग से ओपिनियन मांगा था. आयोग ने अपना ओपिनियन राज्यपाल के पास भेज दिया है. राज्यपाल इस ओपिनियन को सार्वजनिक नही किया है जिसे ये सारा  बखेड़ा खड़ा हुआ है.

ईडी ने भी हेमंत पर कसा शिकंजा, सीएम के अनुरोध को नकारा

इन सबके बीच प्रवर्तन निदेशालय ने हेमंत के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया जिससे हेमंत सरकार को ईडी के समक्ष 17 नवंबर को ही उपस्थित होना होगा. बता दें इससे पूर्व इडी ने उन्हें पहली बार समन भेज कर तीन नवंबर को हाजिर होने का निर्देश दिया था. हालांकि, मुख्यमंत्री उस दिन हाजिर नहीं हुए और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत रायपुर चले गये. उन्होंने इडी को पत्र लिख कर अपनी व्यस्तता के आधार पर तीन सप्ताह का समय मांगा था. इडी के अधिकारियों ने उन्हें तीन के बदले दो सप्ताह का समय दिया और 17 नवंबर को हाजिर होने का निर्देश दिया. जिसके बाद हेमंत सोरेन ने पुनः इडी से अनुरोध किया था कि वह अपनी व्यस्तता की वजह से इडी के सम्मन  के आलोक में 17 नवंबर के बदले 16 नवंबर को इडी कार्यालय पहुंचना चाहते हैं. निर्धारित समय से पहले पूछताछ के लिए पेश होने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को प्रवर्तन निदेशालय (इडी) ने नामंजूर कर दिया है. सूत्रों के अनुसार इडी का मानना है कि इस मामले में अगर एक बार किसी को भी छूट दी गयी, तो फिर यह परंपरा बन सकती है. इसलिए इडी ने आग्रह मानने से इंकार कर दिया है. वहीं हेमंत बार बार इनसबके पीछे राजनीतिक षड्यन्त्र को कारण बता रहे .

केंद्र के पास है ईडी और सीबीआई का हथियार 

इन घटनाओं के पलटवार में सीएम ने भी राज्यपाल विपक्ष सहित केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इन सभी कारवाई को लेकर हेमंत सोरेन केंद्र सरकार पर लगातार हमला कर रही है और इन सबसे पीछे राजनीति को कारण मान रही.  एक समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र से हक मांगने पर ईडी व सीबीआई को दौड़ा देते हैं. सोरेन ने कहा कि कोरोना काल के बाद जब हम झारखंड के विकास में जुटे हैं, तो विपक्षी दल सरकार गिराने में लगे हुए हैं. ये रोज सरकार गिराते हैं और रोज मुख्यमंत्री बनाते हैं. पता नहीं और कितनी बार मुख्यमंत्री बनायेंगे.

पूजा सिंघल और पकंज मिश्रा मनी लॉन्ड्रिंग  केस के लिए जारी हुआ सम्मन

इडी ने साहिबगंज में अवैध खनन के सिलसिले में पूछताछ के लिए मुख्यमंत्री के विशेष प्रतिनिधि पंकज मिश्रा द्वारा अवैध खनन में शामिल होने और 42 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति अर्जित करने समेत अन्य कई मामलों में  मुख्यमंत्री को दूसरी बार सम्मन जारी किया है. मनी मनी लॉन्ड्रिंग  के आरोप में फंसी आइएएस अधिकारी पूजा सिंघल को खान विभाग में पदस्थापित करने के कारणों के अलावा प्रेम प्रकाश के घर से मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा के लिए तैनात जवानों के नाम आवंटित दो एके-47 और 60 गोलियों का मिलना भी समन किये जाने का कारण है. इडी ने पंकज के रिम्स में भर्ती रहने के दौरान फोन पर अधिकारियों से बात करने और मुख्यमंत्री के नाम पर उन्हें डराने का मामला भी तूल पकड़ा है.

हेमंत सोरेन ने भी खोला मोर्चा, दिए एसीबी  को जांच के निर्देश

इधर  रघुवर सरकार के पांच मंत्रियों के खिलाफ होगी एसीबी जांच, सीएम हेमंत सोरेन ने दे दी मंजूरी. रघुवर सरकार के पांच मंत्रियों के खिलाफ एसीबी जांच करेगी. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पूर्ववर्ती बीजेपी की रघुवर दास सरकार के पांच मंत्रियों नीरा यादव, रणधीर कुमार सिंह, अमर कुमार बाउरी, नीलकंठ सिंह मुंडा और लुईस मरांडी की संपत्ति में अप्रत्याशित वृद्धि के मामले में मंत्रिमंडल सचिवालय और निगरानी विभाग को मामला दर्ज कर जांच शुरू करने का निर्देश दिया है. वर्ष 2020 में इन पांच तत्कालीन मंत्रियों की संपत्ति की जांच की मांग को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गयी थी. इस याचिका में प्रार्थी पंकज कुमार यादव ने आरोप लगाया था कि बहुत कम समय में मंत्रियों की आय में अप्रत्याशित तौर पर वृद्धि हुई है. इसके प्रमाण में निर्वाचन आयोग के समक्ष उनकी संपत्ति के विवरण से संबंधित दाखिल शपथपत्र का हवाला दिया गया था. इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर पूर्व में निगरानी विभाग ने एंटी करप्शन ब्यूरो को इसकी जांच कराने का आदेश दिया था. जिस पीआईएल के दस्तावेजों के आधार पर एसीबी ने इन पूर्व मंत्रियों से जुड़े मामले की प्रारंभिक जांच की थी, उसमें यह कहा गया है कि वर्ष 2014 में अमर बाउरी की संपत्ति 7.33 लाख थी, जो 2019 में 89.41 लाख हो गई. इसी तरह रणधीर कुमार सिंह की ओर से 2014 में घोषित 78.92 लाख की संपत्ति साल 2019 में बढ़कर 5.06 करोड़ हो गई.  

किसकी होगी शाह और कौन खाएगा मात 

ये खेल जितना सरल दिख रहा उतना है नहीं  राज्यपाल और मुख्यमंत्री आमने सामने है. सीएम विपक्ष के साथ साथ केंद्र सरकार को भी लगातार  घेर रहे जिस से उनकी बौखलाहट साफ दिख रही है. इस सियासी शरतरंज मे किसकी होगी जीत और किसको मिलेगी मात ये तो झारखंड का आनेवाला भविष्य ही बताएगा परंतु 22 वर्षीय झारखंड के नसीब में  केवल राजनीतिक सुर्खिया ही आई. विकास उन्नति और प्रसंशा से कोसों दूर ये सुंदर प्रदेश अपने सुंदर भविष्य की राह देख रहा.

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