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चैता और चौपाल की गूंज : समय की धूल में दबकर खो न जाए यह अनमोल धरोहर…

BY -
Rajnish Sinha
Rajnish Sinha
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 2, 2026, 12:08:06 PM

TNP DESK : कभी फागुन का महीना आते ही गांवों की गलियों से लेकर चौपाल तक चैता और लोकगीतों की मधुर गूंज सुनाई देती थी. ढोलक की थाप, मंजीरे की छनकार और सुरों में घुली मिट्टी की महक पूरे वातावरण को रंगीन बना देती थी. लेकिन बदलते समय के साथ अब यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती नजर आ रही है.

गीतों में प्रेम, विरह, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती थी

फागुन में गाए जाने वाले चैता गीत सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं थे बल्कि ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक पहचान थे. खेत-खलिहानों में काम करते किसान शाम को चौपाल पर जुटते बुजुर्ग और उत्साहित युवा सब मिलकर सामूहिक गायन के जरिए आपसी भाईचारे को मजबूत करते थे. गीतों में प्रेम, विरह, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती थी.

नई पीढ़ी इन लोकगीतों के बोल और धुन से अनजान होती जा रही है

आज स्थिति बदल चुकी है. गांवों में भी मोबाइल फोन, डीजे और आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने पारंपरिक लोकगायन की जगह ले ली है. जहां पहले चौपाल पर देर रात तक चैता की महफिल सजती थी वहीं अब सन्नाटा पसरा रहता है. नई पीढ़ी इन लोकगीतों के बोल और धुन से अनजान होती जा रही है.

ग्राम स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता

सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इन लोक परंपराओं को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और संग्रहालयों में ही चैता और चौपाल की परंपरा के बारे में पढ़ सकेंगी. स्कूलों और सामाजिक आयोजनों में लोकगीतों को बढ़ावा देने,  स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करने और ग्राम स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता है.

यह अनमोल धरोहर समय की धूल में दबकर खो न जाए

फागुन का असली रंग तभी लौटेगा जब चौपाल फिर से सजेगी और चैता की मधुर तान गांव-गांव में गूंजेगी. जरूरत है सामूहिक प्रयास की ताकि हमारी लोक संस्कृति की यह अनमोल धरोहर समय की धूल में दबकर खो न जाए.

 

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