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ऐसे ही नहीं था खूंखार दिनेश गोप, हत्या-लूट के साथ पीएलएफआई की बांटता था फ्रेंचाइजी, अपनी वाइफ से करवाता था वसूली

BY -
Ranchi Bureau
Ranchi Bureau
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 4:11:47 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK):-पिछले दो दशक के ज्यादा वक्त से दहशत का साम्राज्य खड़ा करने वाले नक्सली दिनेश गोप अब कानून के शिकंजे में हैं. सलाखों के पीछे जाने के बाद खौफ का खेल बहुत हद तक खत्म हो गया है. कारोबारी, ठेकेदार, निजी संस्थाएं ,सरकार और पुलिस ने राहत की सांस ली है . अहिस्ते-अहिस्ते इसके पीएलएफआई का नेटवर्क भी दरकने लगा है. हथियार बरामदगी होने लगी है , इसके साथ ही उसके साथी भी बिखरने और पकड़ाने लगे हैं . दिनेश गोप को एनआईए ने काफी मश्शकत के बाद नेपाल से पकड़ा था, वह वहां सिख बनकर ढाबा चला रहा था. ताकि कोई उसकी शिनाख्त न कर सके. हालांकि, जुर्म की दुनिया में बेताज बादशाह बनकर दो दशक तक पुलिस से आंख मिचौली खेल रहा दिनेश पकड़ में तो आ ही गया. लेकिन, उसके काले कारनामे, जुर्म की लंबी फेहरिश्त और खौफ का राज कायम करने की लंबी दास्तान ,उसके 150 से ज्यादा दर्ज मुकदमे खुद ब खुद उसके दर्द बाटने की कहानी बता देते हैं. फिर भी इस कुछ ऐसी अनुसनी बाते भी हैं, जो कोई नहीं जानता है कि, यह दुर्दांत नक्सली कितना खतरनाक था. जो पैसे का तो खूब प्यास था, लेकिन इसके लिए दूसरों की जिंदगी की कीमत कुछ नहीं थी.

फौज में भर्ती नहीं हो सका दिनेश गोप

बताया जाता है कि दिनेश गोप भारतीय सेना में भर्ती के लिए चुना गया था. इसे लेकर सेना का ज्वाइनिंग लेटर भी भेजा गया था . लेकिन, गांव के दंबंगों ने खत को उसके घर पहुंचने ही नहीं दिया. इसकी जानकारी दिनेश के भाई सुरेश गोप की हुई, तो इसका उसने विरोध औऱ बगावत शुरु कर दी . कई लोगो सुरेश का संबंध नक्सलियों से भी होने की बात कहते थे . 2000 में पुलिस की गोली से सुरेश गोप की मौत हो गई. इसके बाद दिनेश गोप ओडिशा भाग गया . कुछ दिन बाद जब वह वापस लौटा तो बिल्कुल बदल चुका था . उसकी आंखों बदले की भावना और हाथों में बंदुक थी. जो गरीबों और मजलूमों की हक की बात करता था.

झारखंड लिबरेशन टाइगर का गठन

इसकी बुनियाद 2003 के जनवरी-फरवरी महीने में खूंटी के एक छोटे से जंगल गरइ में हुई थी. जिसमे करीब छह लोग मिलकर एक हथियारबंद संगठन की नींव रखी थी. जो बाद में जेएलटी यानि झारखंड लिबरेशन टाइगर नाम का संगठन बना. उस दौरान माओवादियों और साहू गिरोह की तूती बोलती थी. इससे लोहा लेने के लिए जेएटली ने खूब खून-खराबा किया. माओवादियों और जमीदारों का लहू बहने के बाद , संगठन  साख और पकड़ जमीन पर मजबूत होती गई. दिनेश गोप के भी बादशाहत और खौफ का दायार बढ़ने लगा. यह अहसास और भरोसा लोगों को जागा कि माओवादियों औऱ दंबंगों से आजादी यह संगठन ही दिला सकता है. वही ,कुछ लोग विचारधारा औऱ खौफ से भी इस संगठन से जुड़ गये. इसके नेटवर्क और प्रभाव के जद में राजनेता से लेकर पुलिस अफसर तक शामिल थे. .

बांटने लगा पीएलएफआई की फ्रेंचाइजी

संगठन के फैलता दायरा औऱ बढ़ते रुतबे का आलम यह था कि दिनेश गोप के दिमाग में खलबली मचने लगी. वह इसका विस्तार राष्ट्रीय स्तर तक करने की सोची. लिहाजा, 2006 में जेएलटी का नाम हमेशा के लिए खत्म कर दिया . जिसे बदलकर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया यानि पीएलएफआई कर दिया गया. अपनी सोच को जमीन पर उसने उतार भी दिया, उसका बिजनेस मॉडल यह था कि वह अपने संगठन की फ्रेंचाइजी देने लगा, लिहाजा, उसका नेटवर्क अन्य राज्यों में फैल सके. इस दौरान उसकी हैसियत और ताकत इस कदर फैल गई मानों वह बेताज बादशाह हो.राजनेता, पुलिस, ठेकेदार और कारोबारी उसके चक्कर लगाने लगे . वक्त के साथ उसकी दहशत भी बढ़ती गई, हत्या, लूट और वसूली का वह मास्टर बन गया था. उसके खिलाफ मुंह खोलने की हिमाकत मौत को दावत देना था. शाम सात बजे के बाद से ही खूंटी इलाके में सन्नाटा पसर जाता था.

बच्चों और अपराधियों को करता था शामिल

संगठन का विस्तार के लिए पीएलएफआई को लड़ाकू लड़कों की जरुरत था. लिहाजा, वह कम उम्र के नौजवानों और अपराधियों को लालच देकर फंसाता था. वह,मोटरसाइकिल, पैसे और सामान देकर उनका दिल जीतता था . इसके बाद वह वसूली औऱ हमले को अंजाम दिलवाता था.  जिसके चलते पीएलएफआई में सदस्यों की संख्या में इजाफा हुआ. इतना ही नहीं वह संगठन का कैंप खूंटी-सिमडेगा-गुमला बार्डर इलाके में फैले जंगलों में ट्रेनिंग कैंप चलाता था. जो एक महीने तक भी लगाया जाता था. जिसमे 350 से 400 उग्रवादी ट्रेनिंग लेते थे

विदेशी तस्करो सें सांठगांठ

ऐसा बोला जाता है कि साल 2006 पीएलएफआई सुप्रीमो दिनेश गोप का संबंध विदेशी तस्करों से हुआ. जिसके बाद उसे हथियार, गोला-बारुद की कमी नहीं हुई. एक से एक अत्याधुनिक हथियार AK-56 ,एलएमजी और M16 जैसे असाल्ट राइफल उसे हासिल होने लगी. इस बात का खुलासा तब हुआ, जब पीएलएफआई उग्रवादियों के गिरफ्तारी हुई थी.

दो बीबियों से करवाता था वसूली

दिनेश गोप की दो वाइफ है, जिसका नाम हीरा देवी और शकुंतला देवी हैं. वह पत्नियों और रिश्तेदारों की मदद से अपनी काली कमाई शेल कंपनियों की मदद से निवेश करता था. कुछ कारोबारी भी इसमे उसका साथ देते थे , जिसके के जरिए वह पैसों को निवेश करता था. पुलिस ने 2020 में उसकी दोनों बीबियों को गिरफ्तार किया था. उनपर लेवी वसूली के साथ-साथ टेरर फंडिंग के आरोप भी साबित हो चुके हैं.

दिनेश गोप की रिमांड खत्म होने के बाद, वह क्या-क्या खुलासा करता है, इसपर सभी की नजर रहेगी. साथ ही किस सफेदपोश,खाकी और कारोबारी का नाम आएगा. इसे लेकर भी आम लोगों में सुगबहुगाहट है, क्योंकि, लाजामी है कि दहशत और जुर्म की इस सल्तनत में इतन दिनों तक राज दिनेश गोप यू ही नहीं किया.  इसमे कई मददगार और राजदार शामिल हैं.

रिपोर्ट-शिवपूजन सिंह

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