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ग्रामीण कार्य विभाग में भ्रष्टाचार पर सियासत तेज, अभियंताओं के ‘यू-टर्न’ से बढ़ा विवाद, बाबूलाल मरांडी करा सकते हैं फोरेंसिक जांच

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 8, 2026, 2:41:02 PM

चाईबासा (CHAIBASA): झारखंड सरकार के ग्रामीण कार्य विभाग में कथित भ्रष्टाचार को लेकर राजनीतिक घमासान लगातार तेज होता जा रहा है. विभाग में टेंडर प्रक्रिया, कमीशनखोरी, पदस्थापन और शिकायत पत्रों को लेकर उठे विवाद ने अब सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच बड़ी राजनीतिक बहस छेड़ दी है. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा मामला उठाए जाने के बाद विभाग की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है. वहीं राजनीतिक सूत्रों के अनुसार शिकायत पत्र की सत्यता को लेकर हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने पर भी विचार किया जा रहा है.

सूत्रों के मुताबिक ग्रामीण कार्य विभाग के मुख्य अभियंता कार्यालय के 10 अभियंताओं ने कुछ समय पहले मंत्री दीपिका पांडेय सिंह के करीबी बताए जा रहे बबलू मिश्रा उर्फ “मामा जी” के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. इस शिकायत के आधार पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की थी. हालांकि बाद में सभी अभियंताओं ने कथित तौर पर अपने ही शिकायत पत्र से इनकार कर दिया. सूत्रों का दावा है कि विभागीय दबाव के कारण अभियंताओं ने यू-टर्न लिया, जिससे मामले ने नया मोड़ ले लिया है. अब विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को संदेहास्पद बताते हुए शिकायत पत्र और हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने की तैयारी में है.

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि मुख्य अभियंता सरवन कुमार के कार्यकाल में हुए कथित टेंडर घोटाले, टेंडर मैनेजमेंट और कमीशनखोरी के मामलों को केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की जा सकती है. सूत्रों के अनुसार विपक्ष विभाग से जुड़े कॉल डिटेल और फेसटाइम संपर्कों की जांच कराने की भी तैयारी में है. इस मामले में कांग्रेस के अंदर भी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं. राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस के कुछ विधायक पहले ही विभागीय कार्यशैली और मंत्री के करीबी लोगों के प्रभाव को लेकर पार्टी आलाकमान से शिकायत कर चुके हैं. यही वजह है कि अब सत्ता पक्ष के भीतर भी इस मुद्दे पर असहजता बढ़ती दिख रही है.

ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. आरोप है कि कई योजनाओं में नियमों के विपरीत टेंडर निष्पादन पर मौखिक रोक लगाई गई, जिससे एक साल से अधिक समय तक प्रक्रियाएं लंबित रहीं. बाद में बीड वैलिडिटी खत्म होने के बाद संवेदकों से दोबारा आवेदन लेने की प्रक्रिया शुरू की गई. विपक्ष इसे भ्रष्टाचार और टेंडर मैनेजमेंट का हिस्सा बता रहा है. सूत्रों के मुताबिक झारखंड हाईकोर्ट ने भी विभाग में जूनियर अधिकारी को सीनियर पद पर बैठाने के मामले में सरकार को निर्देश दिया है. संवेदक संगठनों का आरोप है कि पदस्थापन और तकनीकी प्रक्रियाओं में गड़बड़ी कर योग्य संवेदकों को बाहर किया गया.

इस पूरे विवाद के बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कोटे के दो मंत्रियों में बदलाव हो सकता है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय विवाद ने सरकार की छवि पर असर डालना शुरू कर दिया है.

गौरतलब है कि ग्रामीण कार्य विभाग पहले भी भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सुर्खियों में रहा है. पूर्व में विभाग से जुड़े मामलों में कई बड़े अधिकारी और नेता जेल जा चुके हैं. ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मौजूदा विवाद की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या सरकार इस मामले में कोई बड़ा कदम उठाती है या नहीं.

रिपोर्ट : संतोष वर्मा

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