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दुमका: राजमहल लोकसभा सीट पर झामुमो प्रत्यासी को अपनों से खतरा, JMM विधायक लोबिन हेम्ब्रम निर्दलीय ठोकेंगे ताल

BY -
Aditya Singh
Aditya Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
Published: March 31, 2024,
Updated: 4:41 AM

दुमका (DUMKA): लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा हो चुकी है. संथाल परगना प्रमंडल में लोकसभा के 3 सीट है, दुमका, गोड्डा और राजमहल. तीनों सीट पर अंतिम चरण में 1 जून को मतदान होगा. मतदान भले ही अंतिम चरण में हो लेकिन क्षेत्र में नेताओं की सक्रियता अभी से ही काफी बढ़ गयी है. आज हम बात कर रहे हैं राजमहल लोक सभासीट की.

लोबिन हेम्ब्रम समय-समय पर पेश कर रहे आपनी दावेदारी

वैसे तो संथाल परगना प्रमंडल को झामुमो का गढ़ माना जाता है. मोदी लहर के बाबजूद वर्ष 2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में झामुमो ने इस सीट को अपने पास सुरक्षित रखा. झामुमो के विजय हांसदा लगातार दो बार इस सीट से जीत का परचम लहरा चुके हैं. वैसे 2024 के चुनाव के लिए झामुमो ने अपने प्रत्यासी के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन घोषणा से पहले ही दावेदार सामने आने लगे है. पार्टी द्वारा विजय हांसदा को तीसरी बार प्रत्यासी बनाए जाने की संभावना के बीच बोरियो से झामुमो विधायक लोबिन हेम्ब्रम भी समय-समय पर अपनी दावेदारी पेश करते नजर आ रहे हैं. वैसे भाजपा ने राजमहल के दंगल में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी पर दाव लगाया है.

क्या है राजमहल लोक सभासीट का सियासी गणित

राजमहल लोक सभा सीट 1957 में अस्तित्व में आया. जिसमें कांग्रेस के टिकट पर पालिका मुर्मू चुनाव जीत कर सांसद बने. 1962 और 1967 के चुनाव में झारखंड पार्टी तो 1971 में कांग्रेस के टिकट पर ईश्वर मरांडी चुनाव जीतने में सफल रहे. 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर एंथोनी मुर्मू सांसद चुने गए. 1980 और 1984 में कांग्रेस प्रत्यासी सेठ हेम्ब्रम को सफलता मिली. 1989 और 1991 के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रत्यासी साइमन मरांडी ने राजमहल सीट पर कब्जा जमाया. 1996 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी किया और पार्टी प्रत्यासी थॉमस हांसदा सांसद चुने गए. पहली बार 1998 में भाजपा ने इस सीट पर जीत का स्वाद चखा. पार्टी प्रत्यासी सोम मरांडी की जीत हुई. लेकिन 1999 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्यासी थॉमस हांसदा की वापसी हुई.अलग झारखंड राज्य बनने के बाद वर्ष 2004 में झामुमो प्रत्यासी हेमलाल मुर्मू की जीत हुई. 2009 में भाजपा प्रत्यासी देवीधन बेसरा की जीत हुई. 2014 और 2019 में जब पूरे देश मे मोदी लहर था उस समय भी इस सीट पर कमल मुरझा गया. कांग्रेस नेता थॉमस हांसदा के पुत्र विजय हांसदा ने तीर धनुष के सहारे झामुमो का गढ़ माने जाने वाले संथाल परगना के राजमहल सीट पर कब्जा जमाए रखा.

 

राजमहल लोक सभा क्षेत्र अंतर्गत कुल 6 विधानसभा आता है. राजमहल, बोरियो, बरहेट, पाकुड़, महेशपुर और लिट्टीपाडा. बोरियो, बरहेट, लिटीपाडा और महेशपुर सीट पर झामुमो का कब्जा है जबकि राजमहल से भाजपा और पाकुड़ से कांग्रेस के विधायक हैं.

झामुमो प्रत्यासी के मार्ग में अपने ही दल के विधायक बनेंगे अवरोधक

राजमहल लोकसभा से भाजपा ने ताला मरांडी को उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो द्वारा अभी तक प्रत्यासी के नाम की घोषणा नहीं की गयी है. उम्मीद है कि विजय हांसदा पार्टी प्रत्यासी बनकर जीत की हैट्रिक लगाने मैदान में उतरे. लेकिन विजय हांसदा के राह का सबसे बड़ा अवरोधक बनकर अपने ही पार्टी के विधायक लोबिन हेम्ब्रम खड़े हो गए है. लोबिन की मंशा झामुमो के सिम्बल पर राजमहल सीट से लोक सभा चुनाव लड़ने की है. इसके लिए वे संसदीय क्षेत्र का सघन दौरा कर रहे है. पाकुड़ में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने अपनी मंशा उजागर की. उन्होंने  कहा कि क्षेत्र भ्रमण के दौरान लोगों का कहना है कि यहां कैंडिडेट बदलना चाहिए. लोगों का कहना है कि अगर झामुमो लोबिन हेंब्रम को टिकट देती है तो ठीक, अन्यथा निर्दलीय चुनाव मैदान में आएं.उन्होंने कहा कि जगह जगह विजय हांसदा का विरोध हुआ, पार्टी आलाकमान तक शिकायत की गई. झामुमो विधायक होने के नाते झामुमो का मान, सम्मान और शान कैसे बचेगा इसलिए अपने कदम को आगे बढ़ाया है. एक बार सीएम से मिलकर वस्तु स्थिति से अवगत कराया जाएगा. उनसे अनुरोध किया जाएगा कि झारखंड में एकमात्र राजमहल सीट से झामुमो के सांसद हैं. अगर वहां भी पराजय मिल गई तो झामुमो के मान सम्मान को ठेस पहुंचेगी. इसके बावजूद अगर पार्टी विजय हांसदा को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतरती है तो आम लोगों की भावना का कद्र करते हुए खुद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारने का मन बना चुके हैं, क्योंकि जनता उन्हें विकल्प के रूप में देख रही है.

बढ़ सकती है विजय हांसदा की मुश्किलें

ज्ञात हो कि राजमहल लोक सभा क्षेत्र अंतर्गत बोरियो से लोबिन हेम्ब्रम विधायक हैं. उनका अपना वोट बैंक हैं. झामुमो के कद्दावर नेता रहे हैं. वे अपना आदर्श पार्टी सुप्रीमो शीबू सोरेन को मानते हैं, लेकिन हेमंत सोरेन के नेतृत्व को स्वीकार्य नहीं कर पाए हैं. तभी तो 2019 में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही लोबिन हेम्ब्रम सड़क से लेकर सदन तक अपनी ही सरकार को समय समय पर आईना दिखाते रहे हैं. पार्टी राजमहल सीट से उन्हें अपना प्रत्यासी बनाये इसके आसार कम नजर आ रहे हैं. ऐसी स्थिति में अगर लोबिन हेम्ब्रम पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद पड़े तो विजय हांसदा की मुश्किलें बढ़ सकती है. जो भी हो, इतना तय है कि राजमहल का दंगल इसबार काफी दिलचस्प होगा. एक तरह भाजपा इस सीट पर जीत हासिल करने के लिए जमकर पसीना बहा रही है वहीं दूसरी तरफ तमाम झंझावातों के बाबजूद झामुमो जीत की हैट्रिक लगाने के मकसद से चुनावी समर में कूद पड़ी है. लोबिन के निर्दलीय मैदान में आने में मुकाबला काफी दिलचस्प होने के आसार हैं.

रिपोर्ट. पंचम झा

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