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हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से देश की 47 लोकसभा सीटों पर क्या पड़ेगा असर! आदिवासियों के मौन से संशय में बीजेपी

BY -
Sanjeev Thakur CW
Sanjeev Thakur CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 10:25:51 AM

रांची (TNP Desk) : आदिवासी समाज का सबसे बड़ा नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बाद उनके बेटे व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बीते चार सालों में उभर कर सामने आया है. हेमंत सोरेन ने चार साल में जितने काम किये उससे आदिवासी समाज ही नहीं बल्कि मूलवासियों में भी बदलाव आया है. इन चार सालों में हेमंत सोरेन ने अपने आप को एक युवा नेता और आदिवासी चेहरा के रूप में स्थापित किया है. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान राज्यहित में कई काम किये. उन्होंने कई योजनाएं लायी जिसका लाभ राज्य के सभी वर्गों को मिला. राज्य के एक-एक समस्या का हेमंत सोरेन ने निराकरण किया. चाहे गरीब, मजदूर, आदिवासी, बिरहोर, कुर्मी हो या मूलवासी सभी की समस्याओं का समाधान करते हुए दिखे. हेमंत सरकार के कार्यकाल से सभी लोग संतुष्ट दिखे. विकट परिस्थिति के बावजूद एक राज्य का मुखिया होने के नाते उन्होंने सभी का ख्याल रखा. 

हेमंत की गिरफ्तारी से गुस्से में आदिवासी समाज

अभी कुछ महीनों बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इसके बाद झारखंड में विधानसभा चुनाव होगा. अभी अपने बचे हुए कार्यकाल में और काम करते, लेकिन उससे पहले ही कथित जमीन घोटाले मामले में ईडी ने हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया. हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से देश के पूरे आदिवासी समाज में रोष है, अंदर ही अंदर गुस्सा उबल मार रहा है. ये गुस्सा कब फूट पड़ेगा यह कहना मुश्किल है. आदिवासी समाज को ये भी डर सता रहा है कि अगर हेमंत सोरेन की रिहाई नहीं हुई तो हमारा नेता कौन होगा. क्योंकि वे एक आदिवासी नेता के रूप में बनकर उभरे हैं. कहीं न कहीं आदिवासी समाज का गुस्सा बीजेपी की और इशारा कर रहा है. उसे ये लगने लगा है कि बीजेपी के वजह से ही हमारा नेता हेमंत सोरेन जेल गया है.

लोकसभा चुनाव से पहले हुई हेमंत की गिरफ्तारी

हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई जब लोकसभा चुनाव नजदीक है. झारखंड की बात करें तो यहां लोकसभा की 14 सीटें हैं. कुछ दिन पहले हेमंत सोरेन ने दावा किया था कि इंडिया गठबंधन 14 में से 13 सीटें अपने नाम करेगी. चूंकि अब हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया गया है तो इससे लोकसभा चुनाव पर भी असर पड़ेगा.

देश की 47 लोकसभा सीटों पर पड़ेगा असर

अब से कुछ महीने बाद 18वीं लोकसभा चुनाव होने वाला है, जिसमें आदिवासियों के लिए 47 सीट रिजर्व है. यह कुल सीटों का सिर्फ 9 फीसदी है. देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप में शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन की होती है. आदिवासी समाज शिबू सोरेन को दिशोम गुरु भी कहते है. राजनीति के जानकारों का कहना है कि यही वो वजह है जिसके कारण हेमंत की गिरफ्तारी को विपक्ष ने आदिवासी अस्मिता से जोड़ दिया है, जबकि सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं ने इस पर चुप्पी साध ली है.

राजनीति में आदिवासी समाज की ताकत

अगर जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो देश में आदिवासियों की कुल संख्या 10 करोड़ के लगभग में है. इसी आबादी को देखते हुए आदिवासियों के लिए लोकसभा में 47 सीटें आरक्षित की गई हैं. लोकसभा की कुल सीटों का यह करीब 9 फीसदी है. आदिवासियों के लिए मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 6, ओडिशा और झारखंड में 5-5, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र में 4-4, राजस्थान में 3, कर्नाटक, आंध्र और मेघालय में 2-2, जबकि त्रिपुरा में लोकसभा की एक सीट आरक्षित है. आरक्षित सीटों के अलावा लोकसभा की करीब 15 सीटें ऐसी हैं, जहां पर आदिवासी समुदाय की आबादी 10-20 प्रतिशत के आसपास है. यानी इन सीटों पर भी आदिवासियों की अहम भूमिका है.

आदिवासियों के वोटिंग पैटर्न में आया काफी बदलाव

लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में आदिवासियों ने जमकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया, जबकि विधानसभा चुनाव में आदिवासियों का वोट विपक्ष को ज्यादा मिला. यानि कि आदिवासियों के वोटिंग में काफी बदलाव आया है. अगर वर्ष 2014 की बात करें तो आदिवासियों के लिए रिजर्व 47 में से 26 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी. विपक्ष पार्टियों ने 21 सीटों पर फतह हासिल किया था. वहीं 2019 में आदिवासियों के लिए रिजर्व 47 में से करीब 28 सीटें बीजेपी को गई थी. वहीं विपक्ष पार्टियों को 19 सीटों पर जीत मिली थी. 

आदिवासियों के मौन से बीजेपी में खलबलाहट

अब जब हेमंत सोरेन की गिरफ्तार हो गई है तो इसकार आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा. क्योंकि अभी तक आदिवासी समाज अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है. अब इनकी चुप्पी से बीजेपी बैचेन हो गई है. उन्हें ये डर सता रहा है कि कहीं रिजर्व 47 सीटें हाथ से न निकल जाए. जानकारों का कहना है कि हेमंत की गिरफ्तारी से बीजेपी को लोकसभा चुनाव में नुकसान होने वाला है. इसी वजह से बीजेपी हेमंत पर न हमला करके कांग्रेस पर निशाना साध रही है. वहीं जानकारों का मानना है कि आदिवासियों को समझ पाना बहुत मुश्किल है. क्योंकि आदिवासी वोटर्स दो भागों में विभाजित है. पहला भाग शिबू सोरेन को आदिवासी समाज अपना नेता मान रहा है. वहीं दूसरा भाग अभी के युवा हेमंत सोरेन को नेता मान रहे हैं. अब देखना होगा कि आने वाले चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगी.

 

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