झारखंड (JHARKHAND): जब भी हम झारखंड की बात करते है तो हमारे दिमाग में एक परिदृश्य बन कर उभरता है, जल-जंगल और जमीन या फिर कोयला खनन लेकिन इन सब के बीच यहाँ की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है महुआ और हड़िया. आज के जमाने में इसको भले ही बुरा या नशे का साधन समझते हो लेकिन अगर हम झारखंड की पगडंडियों पर चले तो आपको पता चलेगा की आदिवासियों के लिए महुआ सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि उनकी संस्कृति, उनकी अर्थव्यवस्था और सबसे बढ़कर उनके लिए एक औषधि के रूप है. अकसर लोग महुआ और हड़िया के पीछे छिपे उस औषधीय सच नहीं समझ पाते और तरह तरह की धारणाएँ बना लेते है.
कल्पवृक्ष के समान हर पेड़
झारखंड में आपने कई तरह के पेड़ देखेंगे होंगे, उसकी खासियत भी देखी होगी लेकिन क्या आपको पता है की झारखंड के आदिवासियों कें लिए हर पेड़ कल्पवृक्ष के समान है. मार्च और अप्रैल के महीनों में जब महुआ के फूल टपकते है, तो पूरा एक मीठी महक से सरोबार हो जाता है.
औषधीय गुणों का खजाना
वज्ञानिक शोध के अनुसार, महुआ के फूल में विटामिन, शुगर, कैल्शियम और फास्फोरस जैसे तत्व पाए जाए है. इसके साथ ही महुआ गर्मियों के दिनों के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ है जैसे-
लू और गर्मी से बचाव
आज के समय में झारखंड की गर्मी का पारा 40-45 डिग्री पार चुका है. ऐसे में महुआ का शर्बत या इसके फूलों से बना काढ़ा शरीर को ठंडा रखने में काफी मदद करता है. महुआ एक प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट की तरह काम करता है जो शरीर में पानी की कमी (DEHYDERATION) को बैलन्स करने में मदद करता है.
ऊर्जा में स्रोत
इस अप्रैल मई के ताप्ती धूप में कड़ी मेहनत करने वाले गग्रामीणों के लिए महुआ काफी फायदेमंद साबित होता है. अगर आप महुआ के फूल को अच्छे से सुखाकर रोटी बनाकर उसका सेवन करते है तो आपको काम करने की शक्ति देती है.
पारंपरिक चिकित्सा
झारखंड के जनजातीय समुदायों में महुआ का उपयोग गठिया (ARTHRITIS) के दर्द, खांसी और त्वचा सबंधित रोगों से छुटकारा मिलने में मदद कर सकता है. इसके साथ ही महुआ के फूलों का तेल का उपयोग जोड़ों के दर्द की मालिश के लिए रामबाण की तरह माना जाता है.
हड़िया आदिवासियों का नशे का साधन या औषधीय पेय?
आज के दौर में हड़िया का सुनकर उनके दिमाग में एक ही चीज सामने आती है और वो है ‘नशा’. लेकिन इसके पीछे भी वैज्ञानिक पहलू छुपा हुआ है. हड़िया मुख्य रूप से उबले हुए चावल को रानू बनाकर यानी उसमे जड़ी बूटियों का मिश्रण करके फार्मेन्ट करके के बनाया जाता है.
रानू का मिश्रण
हड़िया को नशा नहीं, बल्कि औषधि बनाने का असली राज ‘रानू’ में छिपा हुआ है. बता दें, रानू लगभग 20 से 25 प्रकार की जंगली जड़ी बूटियों की होती है जिसमे वन हल्दी, छाल, और जड़े जैसे 20 से 25 जड़ी बूटियाँ शामिल होती है. यह जड़ी बूटियाँ शरीर के पाचन तंत्र को दुरुस्त रखती है.
पेट को ठंडक
हड़िया मूल रूप से गर्मियों से आराम देने वाला एक COOLANT है जो इस ताप्ती गर्मी में खेतों में काम करने वाले आदिवासियों (मुंडा, उरांव और संताल समुदाय के लोग इसे पीते है ताकि उनका पेट ठंड रहे और उन्हें लू न लगे.
नशा या परंपरा ?
सरहुल हो कर्मा, बिना हड़िया के तर्पण या पूजा अधूरी मानी जाती है. यह देवताओं में चढ़ने वलय प्रसाद है. गाँव में जब भी महमान आते है तो गाँव के लोग आदर-सत्कार के रूप में उन्हे हड़िया भेंट किया जाता है. यह उनके आपसी भाईचारे और प्रेम का प्रतीक है.
समस्या कहाँ है?
हड़िया को लेकर समस्या तब शुरू हुई जब आज लोगों ने इसके पारंपरिक और औषधीय रूप को बदलकर इसमें मिलावट की जाने लगी. या इसे व्यापार के तौर पर इसको कच्ची शराब के रूप में बेचा जाने लगा. शुद्ध पारंपरिक महुआ और हड़िया स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है लेकिन आज के समय में इसमें यूरिया या अन्य रसायनों की मिलावट ने इसे जानलेवा बना दिया है.