टीएनपी डेस्क(TNP DESK): सड़क पर तेज सायरन, आगे-पीछे दौड़ती पुलिस की गाड़ियां और बीच में मंत्री का वीआईपी काफिला… यह नजारा आपने कई बार देखा होगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर एक मंत्री के काफिले में कितनी गाड़ियां चलती हैं, उनमें कौन-कौन शामिल होता है और इस पूरे इंतजाम पर होने वाला खर्च कौन उठाता है? झारखंड में मंत्रियों और वीआईपी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह उनके पद, खतरे के आकलन और सुरक्षा श्रेणी के आधार पर तय की जाती है. यही कारण है कि किसी मंत्री के साथ तीन-चार गाड़ियां दिखाई देती हैं, तो किसी के काफिले में कई पुलिस एस्कॉर्ट और सुरक्षा वाहन शामिल होते हैं.
दरअसल, मंत्री का काफिला सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होता, बल्कि इसके पीछे सुरक्षा एजेंसियों की विस्तृत रणनीति काम करती है. इसमें पायलट वाहन, एस्कॉर्ट गाड़ी, सुरक्षा बलों की टीम, रिजर्व वाहन और कई बार बुलेटप्रूफ कारें भी शामिल रहती हैं. खासकर संवेदनशील राज्यों या वीआईपी मूवमेंट के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कर दी जाती है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन गाड़ियों के पेट्रोल, रखरखाव, ड्राइवर, सुरक्षा कर्मियों और पूरे काफिले का खर्च सरकारी खजाने से उठाया जाता है.
कितनी गाड़ियां होती हैं काफिले में?
आमतौर पर किसी राज्य मंत्री के काफिले में 3 से 8 तक वाहन देखने को मिलते हैं. इनमें मुख्य वाहन, एस्कॉर्ट वाहन, पायलट गाड़ी, फॉलो वाहन और सुरक्षा बलों की गाड़ियां शामिल हो सकती हैं. जिन मंत्रियों को ज्यादा सुरक्षा श्रेणी मिली होती है, उनके काफिले में वाहनों की संख्या अधिक हो सकती है. झारखंड में मंत्रियों को प्रायः Y+ श्रेणी की सुरक्षा दिए जाने की खबरें सामने आती रही हैं. कई बार मुख्यमंत्री, राज्यपाल या विशेष खतरे वाले नेताओं के काफिले में बुलेटप्रूफ वाहन भी शामिल किए जाते हैं. हाल के वर्षों में झारखंड सरकार ने वीवीआईपी मूवमेंट के लिए कई बुलेटप्रूफ वाहनों की खरीद भी की है.
काफिले में कौन-कौन सी गाड़ियां शामिल होती हैं?
एक सामान्य मंत्री काफिले में आमतौर पर ये वाहन होते हैं: मंत्री की आधिकारिक कार , पायलट वाहन (रास्ता साफ कराने के लिए) , एस्कॉर्ट वाहन, सुरक्षा कर्मियों की गाड़ी , रिजर्व या बैकअप वाहन , कभी-कभी एम्बुलेंस या लोकल पुलिस वाहन . यदि किसी मंत्री को Z या Z+ जैसी उच्च सुरक्षा मिली हो, तो अतिरिक्त सुरक्षा वाहन भी लगाए जा सकते हैं.
पूरा खर्च कौन उठाता है?
मंत्रियों के काफिले पर होने वाला पूरा खर्च राज्य सरकार उठाती है. इसमें शामिल हैं- वाहन खरीदना, पेट्रोल-डीजल का खर्च, ड्राइवर और स्टाफ का वेतन, वाहन मेंटेनेंस, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती , पुलिस एस्कॉर्ट व्यवस्था, ये खर्च गृह विभाग और सरकार उठाती है. सुरक्षा व्यवस्था को सरकारी दायित्व माना जाता है, इसलिए इसका भुगतान सरकारी खजाने से होता है.
क्यों जरूरी माना जाता है काफिला?
मंत्री और वीआईपी नेताओं का काफिला केवल रुतबा दिखाने के लिए नहीं होता, बल्कि इसे उनकी सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है. मंत्री कई संवेदनशील फैसले लेते हैं, महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों में शामिल होते हैं और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर काम करते हैं. ऐसे में उन पर हमले, विरोध प्रदर्शन या सुरक्षा खतरे की आशंका बनी रहती है. इसी वजह से उनके लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था और काफिले की जरूरत पड़ती है. सुरक्षा एजेंसियां लगातार खतरे का आकलन करती हैं और उसी के आधार पर किसी मंत्री को X, Y, Y+ या Z श्रेणी की सुरक्षा दी जाती है. काफिले में पायलट वाहन, एस्कॉर्ट गाड़ी, सुरक्षा बल और रिजर्व वाहन शामिल किए जाते हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके. कई बार वीआईपी मूवमेंट के दौरान ट्रैफिक कंट्रोल और रूट सुरक्षा भी इसी व्यवस्था का हिस्सा होती है.