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दिशोम गुरु शिबू सोरेन का गिरिडीह के डुमरी से था गहरा लगाव, अपने मित्र अखिल चंद महतो के घर में रहकर किया था महाजनी प्रथा का विरोध

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 5:21:17 AM

गिरिडीह (GIRIDIH) : 1970 के दशक में जब शिबू सोरेन अपने संघर्ष के दिनों में पारसनाथ पहाड़ के क्षेत्र में भ्रमण कर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को महाजनी प्रथा के विरुद्ध जागरुक करते थे, इस दौरान पारसनाथ पहाड़ के क्षेत्र में बसे आदिवासी बहुल गांव के साथ-साथ क्षेत्र के तराई वाले हिस्से में भी रहने वाले आदिवासियों एवं वंचित और शोषित वर्ग के लोगों के साथ उनका गहरा संबंध हो गया था. यहाँ उनके कई मित्र बने और उनका साथ दिया जिसमें मुख्य रूप से बेलमा पोरैया के रहने वाले स्व0 अखिल चंद महतो का नाम सामने आता है. शिबू सोरेन और अखिल चंद महतो को अगर खड़ा कर दिया जाता, तो दोनों के चेहरे में ज्यादा अंतर नहीं था, लेकिन दोनों की शारीरिक बनावट लगभग एक जैसी ही थी, जिसके कारण लोग कंफ्यूज हो जाते थे कि आखिर कौन है शिबू सोरेन और कौन है अखिल चंद महतो. यहाँ तक की तत्कालीन समय में कई बार पुलिस भी कंफ्यूज हो जाती थी. 

शिबू सोरेन एक जुझारु व्यक्ति थे जो ठान लिया उसे करना उनकी जिद थी. उन्होंने गांव में रहने वाले लोगों को महाजनी प्रथा से उबार करने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना था और महाजनी प्रथा के विरुद्ध उलगुलान शुरू किया था. इस दौरान उनकी कई मित्र बने जिन में खासकर गिरिडीह जिले के निमियाघाट थाना क्षेत्र अंतर्गत बेलमा पोरैया गांव निवासी अखिलचंद महतो खास थे. 

उनकी पत्नी निर्मला देवी ने बताया कि जब शिबू सोरेन पहली बार उनके घर आए थे तो महिला का रूप धारण कर साड़ी पहन कर आए थे. उन्होंने बताया कि शिबू सोरेन को साड़ी खुलवाकर नए वस्त्र दिए थे और खाना भी खिलाया था. उसे समय लगातार 6 महीने शिबू सोरेन हमारे ही घर में रहकर आंदोलन के साथ ही पिछड़े लोगों के साथ मिलकर जन जागरूकता कार्यक्रम चलाते थे. इस दरमियान उनके पति ने भी उनका साथ देकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन में उनका साथ दिया था और शिबू सोरेन के विश्वास पात्र बन गए थे. जब वे कोयला मंत्री बने तो अपने मित्र के घर उनके छोटे पुत्र के विवाह उत्सव में भाग लिया था. उस वक्त की तस्वीर देखकर यह पता चलता है कि शिबू सोरेन और अखिल चंद महतो में कितनी गहरी दोस्ती थी. 

वहीं शिबू सोरेन के साथी तत्कालीन मुखिया निर्मल महतो ने कहा की उस वक्त को याद कर हममें जोश भर जाता है. उन्होंने आगे कहा कि वह पूरे जंगल में घूमते थे. उन्होंने यह भी कहा कि वे शिबू सोरेन के साथ घुल कट्टा पीतल आदि का भ्रमण करते थे और जंगल में अपने रिश्तेदारों के घर खोजबीन कर भोजन करते थे. 

वहीं अखिल चंद महतो के पुत्र संतोष कुमार का कहना है कि जब वह छोटे थे तो पिताजी के साथ शिबू सोरेन उनके घर आते थे. इस दौरान जब वह पिताजी से पूछते थे कि यह कौन है तो उनका कहना था कि यह शिबू मांझी है. संतोष का कहना था कि उनके पिताजी और शिबू सोरेन की एक ही शक्ल थी, पर वह लोग कभी कंफ्यूज नहीं हुए. वहीं समाजसेवी चंद्र देव बरनवाल का कहना है कि शिबू सोरेन एक आंदोलनकारी व्यक्ति थे उनके गुजरने से झारखंड को एक गहरि चोट पहुंची है. 

रिपोर्ट : दिनेश कुमार रजक

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