टीएनपी डेस्क(TNP DESK):जमशेदपुर एक औद्योगिक नगरी है इसको मिनी मुंबई के नाम से भी जाना जाता है. टाटा स्टील से इसकी पहचान होती है.लेकिन यहां की मंदिर मस्जिद भी विश्व भर में प्रसिद्घ है चाहे यहां का गोल पहाड़ी मंदिर हो, रंगकनी मंदिर हो जाए या चुना साह बाबा की मजार.वैसे तो यहां सैकड़ धार्मिक स्थान ऐसे है जो अपने आप में एक धरोहर को समेटे हुए है जिनका अपना अलग ही इतिहास रहा है, लेकिन आज हम जमशेदपुर के ऐसे मजार के बारे में बात करने वाले है, जहां आकर हिंदू मुस्लिम धर्म मजहब का बंधन टूट जाता है.
शहर के बीचो-बीच बनाया गया है मजार
जमशेदपुर शहर के बीचो-बीच बसे बिस्टुपुर में चूना शाह बाबा का एक ऐसा मजार है जहां मुस्लिम समुदाय के साथ हिंदू लोग भी पूरी इबादत के साथ सजदा करते है.यहां लोग पूरी श्रद्धा भाव के साथ चुना शाह बाबा के मजार चादर चढ़ाते है.वैसे तो रोजाना यहां काफी लंबी लाइन लगती है लेकिन गुरुवार के दिन यहां चादर चढ़ाने की विशेष परंपरा है जहां काफी ज्यादा भीड़ देखी जाती है.बाबा को लेकर एक बात का काफी ज्यादा प्रचारित है कि यहां अगर कोई नौकरी के लिए मन्नत मांगे तो बाबा उनकी मन्नत को बहुत जल्दी पूरी करते है वही मन्नत पूरी होने के बाद लोग यहां आकर चादर चढ़ाते है और शुक्रिया अदा करते है.
झारखंड के साथ पंजाब में भी मनाया जाता है उर्स
चुना बाबा की लोकप्रियता का अंदाज़, आप इस बात से लगा सकते हैं कि जमशेदपुर के साथ-साथ पंजाब में भी उर्स उत्सव मनाया जाता है.आपको बता दें कि पंजाबी लोगों में भी चुना शाह बाबा ने काफी ज्यादा आस्था रखते है पंजाब के अमृतसर जिले में बाबा का उर्स धूमधाम से हर साल मनाया जाता है.आपको बता दें कि चुना बाबा के चमत्कारी किस्से केवल झारखंड तक ही सीमित नहीं है बल्की बंगाल, ओडिशा बिहार के लोग भी यहां मन्नत मांगने के लिए मजार पर पहुंचते है.बाबा किसी को भी खाली हाथ नहीं लौटाते बल्की उनकी झोली में उनकी मन्नत जरूर पूरी करते है.
पढ़े चुना बाबा के चमत्कारी किस्से
आपको बता दें कि बाबा का असली नाम सै. अब्दुर्रहीम उर्फ चूना शाह बाबा था.जो बिहार के समस्तीपुर जिला के रहने वाले थे. जब बाबा जिंदा थे तो टाटा स्टील के चुना भट्ठा प्लांट में काम करते थे.उनके कई ऐसे किस्से है जो उनके चमत्कार और शक्ति को उजागर करते है वह हमेशा चुना खाया करते है और उन्हें कोई भी नुकसान नहीं होता था.इसकी वजह से उनका नाम चूना साहब बाबा पड़ गया.इसको लेकर एक कथा भी है जिसके मुताबिक एक बार चुना वाले बाबा चुना भट्ठा का काम छोड़ कर बैठ गए थे और चुना खा रहे थे, तभी एक विदेशी इंजीनियर उनके ऊपर बमक गया जिसकी वजह चूना शाह बाबा बाहर निकल गए जैसा ही निकले प्लांट का काम पूरी तरह से ठप हो गया.अफ़सरों ने बाबा से काफ़ी कहा मन्नत मांगी तब जाकर फिर से प्लांट का काम शुरू हो पाया जिसके बाद बाबा कंपनी के गेट के सामने ही झोपड़ी ब नाकर रहने लगे.
काफी भव्य है मजार
20 दिसंबर 1970 1 बजकर 1मिनट पर चुना साहब बाबा ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनको मरने के बाद बिस्टुपुर गेट के पास उन्हें दफन नहीं किया जा रहा था. काफी विरोध के बाद टाटा स्टील के अधिकारी माने तब जाकर बिष्ठुपुर गेट के सामने उन्हें दफनाया गया बाद में लोगों की काफी ज्यादा मन्नतें पूरी होने लगी जिसके बाद दरगाह कमेटी ने उनका मजार बना दिया. हर साल धुमधाम से यहां उर्स मनाया जाता है.बाबा की दरगाह संगमरमर के पत्थर से किया गया है जिसको राजस्थान के कारीगरों ने बनाया है.
