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3 सौ वर्ष पहले ननकर राजा बाज बसंत के वंशजों ने कराया था मंदिर का निर्माण, सैंकड़ों वर्षों बाद भी मंदिर की चमक हैं बरकरार...

BY -
Amita Sinha
Amita Sinha
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 2:41:38 AM

क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में एक ऐसा भी गांव है, जहाँ घरों से अधिक मंदिरें हैं और इन्हे बनवाने वाला कोई राजा नहीं बल्कि एक किसान था

हम बात कर रहे हैं झारखण्ड राज्य के दुमका जिले के एक छोटे से गाँव मलूटी की। दुमका जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर छोटा सा गाँव मलूटी दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड क्षेत्र में स्थित है। यहाँ कोई 1-2 नहीं,  कुल 108 मंदिरें हैं। लेकिन आज अस्तिव में मात्र 72 मंदिर ही बचे हैं। इन मंदिरों वाले गाँव को झारखण्ड का गुप्तकाशी भी कहा जाता है।

टेराकोटा से निर्मित हैं यहां की मंदिरें

सालों पहले तक यहां 108 मंदिर हुआ करते थे। इतने ही तालाब भी बने थे। समय बीतता गया और तालाब भरते चले गये और मंदिरों का अस्तित्व भी मिटने लगा।सभी मंदिरों की अपनी विशेषता है। यहां के मंदिरों की अद्भूत स्थापत्य शैली की वजह से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस गांव की चर्चा होती है। यहां सबसे प्राचीन मंदिर मां मौलीक्षा का मंदिर है जिसे मां तारा की बड़ी बहन माना जाता है। तारापीठ की तरह ही यह भी तंत्र साधना का केंद्र है।टेराकोटा से निर्मित यहां की मंदिरें अपनी अद्भुत कलाकृति के लिए जानी जाती है। लगभग 3 सौ वर्ष पहले ननकर राजा बाज बसंत के वंशजों ने मंदिर का निर्माण कराया था।

किसी राजा ने नहीं, किसान ने कराया था मंदिरों का निर्माण

किसी राजा ने नहीं बल्कि बसंत नाम का एक किसान ने कराया था। थातत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन हसन साह ने यह गांव खुश होकर इनाम के तौर पर दिया था, गांव का मालिक बनने पर बसंत को, राजा बसंत कहा जाने लगा। और बाज पकड़ने के कारण इनके नाम में बाज जुड़कर इनका नाम राजा बाज बसंत पड़ा। बसंत राय के वंशज राजा राखोर चंद्र राय मलूटी पहुंचे और मलूटी को ननकर राज्य की राजधानी बनाया।जंगल की सफाई के दौरान मां मौलीक्षा की प्रतिमा जमीन के अंदर मिली। जिसके बाद यहां मंदिरों का निर्माण कराया गया। रामायण और महाभारत के पात्रों को बनाकर मंदिर के सामने दीवार पर लगाया गया है। 

धर्म के साथ साथ इतिहास को भी हैं समेटे हुए हैं मलुटी

सैंकड़ों वर्षों बाद भी इनकी चमक बरकरार है.मलूटी गांव धर्म के साथ-साथ अपने इतिहास को भी समेटे हुए हैं । जरूरत है मंदिर के संरक्षण कार्य को जल्द पूरा करने की, जिससे आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत का अध्यन कर सकें। कला-शिल्प, धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वालों को एक बार मलूटी जरूर आना चाहिए।

पंचम कुमार झा, दुमका

Tags:News

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