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झारखंड में रामनवमी जुलूस का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व, राजनीति का भी होता है दखलांदाजी

झारखंड में रामनवमी जुलूस का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व, राजनीति का भी होता है दखलांदाजी

टीएनपी डेस्क ( TNP DESK) -  यूं तो रामनवमी पूरे देश में मनाया जाता है. लेकिन झारखंड में इसकी एक अलग ही छटा दिखता है. बड़े-बड़े महावीरी झडों से पूरा राज्य पट जाता है. गांव हो या शहर रामनवमी का त्योहार बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है. सभी घरों में महावीरी झंड़े फहराएं जाते है.  रामनवमी के दिन शोभायात्रा में बड़े-बड़े महावीरी पताका फहराया जाता है. लाखों लोग इस शोभायात्रा में शामिल होते हैं. हथियार का प्रदर्शन भी होता है. 

अंजन धाम से जुड़ी है श्रद्धा 

ऐसा माना जाता है कि झारखंड में रामनवमी का त्योहार इतने उत्साह से मनाने के पीछे गुमला का अंजनधाम का भी कनेक्शन है. माना जाता है कि अंजनधाम में ही श्रीराम भक्त हनुमान का जन्म हुआ था. इसलिए झारखंड में हनुमान भक्तों की कमी नहीं है. और जब हर कोई हनुमान भक्त है, तब हनुमान भक्त अपने अराध्यदेव भगवान राम का जन्मोत्सव साधारण कैसे मना सकते हैं. इसलिए झारखंड मे रामनवमी बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. 

राजनीति का भी दखल
झारखंड में रामनवमी में राजनीति का भी पूरा दखल होता है. रामनवमी मनाने के लिए और जुलूस निकालने के लिए लगभग हर शहर और कस्बों में महावीर मंडल का गठन किया जाता है, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के नेता शामिल होते हैं. यहां तक कई इलाकों में विभिन्न राजनीतिक दल का अलग-अलग जुलूस निकलता है. बड़ा नेता हो या छोटा हर नेता जुलूस में शामिल होता है.  नेता बड़े-बड़े  होडिग्स लगा कर रामनवमी की बधाई देते हैं.  
ऐसा माना जाता है कि रामनवमी जुलूस की शुरूआत 1925 में हजारीबाग से शुरू हुई थी, उसके चार साल बाद रांची में जुलूस  निकाला गया.. फिर धीरे-धीरे पूरे झारखंड के हर शहर और गांव-गांव में रामनवमी जुलूस निकालने की परंपरा शुरू हुई है. 

कण-कण में राम

हिन्दू धर्म के बहुत से लोग आज भी नमस्कार के रूप में राम-राम कहते हैं और कोई विपत्ति, भय या संकट होने पर हे राम! कहते हैं. शव यात्रा में राम नाम लिया जाता है, लंका जाने के लिए राम लिखे पत्थर से ही पुल बनाया गया था, जो समुद्र में नहीं डूबा था. पुराणों और शास्त्रों के अनुसार राम का नाम भगवान राम से भी बड़ा है. खुद महादेव भी राम का नाम जाप करते है| राम का नाम दुखों को हरने वाला, दुखों को हराने वाला होता है. माना जाता है राम नाम का जप करने वालों के ऊपर कोई भी परिस्थिति हावी नही होती . वहीँ यदि कोई मनुष्य अपने अंतिम क्षणों में भगवान राम का नाम लेता है तब उसकी आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

राक्षसों के वध और नए धर्म के लिए हुआ श्री राम का जन्म

शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि भगवान विष्णु ने सातवे अवतार में भगवान राम के रूप में त्रेतायुग में जन्म लिया था. भगवान राम का जन्म रावण के अत्याचारों को खत्म करने एवं पृथ्वी से दुष्टों को खत्म कर नए धर्म स्थापना के लिए हुआ था. इसीलिये भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में रामनवमी का पर्व मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार यह भी माना जाता है कि भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा की उपासना की थी. चैत्र मास की नवरात्रि के समापन के बाद ही राम नवमी मनाया जाता है.

रामनवमी का इतिहास

रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियां थी और तीनों रानियों से राजा को  कोई संतान  नहीं था. जिससे राजा दशरथ  काफी चिंतित रहते थे. राजा को संतान प्राप्ति के लिए महर्षि वशिष्ठ ने कमेष्टि यज्ञ कराने को कहा. उनकी बातें मानकर राजा दशरथ ने महर्षि ऋषि श्रंगी से कमेष्टि यज्ञ कराया. यज्ञ समापन के पश्चात महर्षि ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को खीर ग्रहण करवाया. इसके ठीक 9 महीने पश्चात सबसे बड़ी रानी कौशल्या ने भगवान राम को, कैकयी ने भरत को और सुमित्रा ने दो जुड़वां बच्चे लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया.

Published at:09 Apr 2022 06:40 PM (IST)
Tags:News
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