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जब डाकुओं से घिर गईं अपने समय की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी, जानिये किस डकैत ने निकाल लिया था चाकू

जब डाकुओं से घिर गईं अपने समय की मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी, जानिये किस डकैत ने निकाल लिया था चाकू

टीएनपी डेस्क(TNP DESK): मीना कुमारी अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रही हैं. उन्हें Emotional Queen कहा जाता था. एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में उनका जन्म 1 अगस्त, 1932 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. इनका पूरा नाम 'महजबीं बानो' था. मीना कुमारी अपनी दर्द भरी आवाज़ और भावनात्मक अभिनय के लिए दर्शकों के बीच बहुत प्रसिद्ध रही हैं. उनकी 'साहिब बीबी और ग़ुलाम', 'पाकीज़ा', 'परिणीता', 'बहू बेगम' और 'मेरे अपने' दिल को छू लेने वाली कलात्मक फ़िल्में हैं. 

जब उनका जन्म हुआ, तब पिता अली बख्‍श और मां इकबाल बेगम (मूल नाम प्रभावती) के पास डॉक्‍टर को देने के पैसे नहीं थे. हालत यह थी कि दोनों ने तय किया कि बच्‍ची को किसी अनाथालय के बाहर सीढ़ियों पर छोड़ दिया जाए और छोड़ भी दिया गया. लेकिन, पिता का मन नहीं माना और वह पलट कर भागे और बच्‍ची को गोद में उठाकर घर ले आए. किसी तरह मुश्किल भरे हालातों से लड़ते हुए उन्होंने उसकी परवरिश की. मीना के पिता एक पारसी थिएटर में काम किया करते थे और माता एक नर्तकी थीं. परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब रहने के कारण मीना कुमारी को बचपन में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा. वर्ष 1939 में बतौर बाल कलाकार उनको विजय भट्ट की फ़िल्म 'लेदरफेस' में काम करने का मौक़ा मिला. 

अपनी पहचान को तलाशती मीना कुमारी को लगभग दस वर्षों तक फ़िल्म जगत् में संघर्ष करना पड़ा. इस बीच उनकी 'वीर घटोत्कच' (1949) और 'श्री गणेश महिमा' (1950) जैसी फ़िल्में प्रदर्शित तो हुई, पर उन्हें इनसे कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली. वर्ष 1952 में मीना कुमारी को विजय भट्ट के निर्देशन में 'बैजू बावरा' में काम करने का मौक़ा मिला. इस फ़िल्म की सफलता के बाद मीना कुमारी बतौर अभिनेत्री फ़िल्म जगत् में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गईं.

24 मई, 1952 को मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से शादी कर ली. मीना कुमारी की जीवनी 'मीनाकुमारी- ए क्लासिक बायोग्राफ़ी' लिखने वाले विनोद मेहता के अनुसार- "मीना कुमारी और कमाल अमरोही का प्यार मोसम्मी के जूस से शुरू हुआ था. जब कमाल अमरोही मीना कुमारी को देखने पूना के अस्पताल में पहुंचे तो उनकी छोटी बहन ने उनसे शिकायत की कि आपा जूस नहीं पी रही हैं. कमाल ने गिलास अपने हाथों में लिया, मीना के सिर को पलंग से उठाया और गिलास को उनके मुंह तक ले गए. मीना ने एक घूंट में ही सारा जूस ख़त्म कर दिया. हर हफ़्ते कमाल सायन से पूना ड्राइव कर मीना से मिलने पहुंचते.  फिर उन्हें लगने लगा कि हफ़्ते में एक दिन काफ़ी नहीं है.  जिस दिन उन्हें नहीं मिलना होता, वह एक दूसरे को ख़त लिखते. हर रोज़ एक ख़त. लेकिन उन ख़तों पर कोई टिकट नहीं लगाया जाता. वह ख़त वह एक-दूसरे को ख़ुद अपने हाथों से देते. "

लेकिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही के वैवाहिक जीवन में कुछ दिनों बाद ही दरार दिखाई देनी शुरू हो गई. कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को फ़िल्मों में काम करने की अनुमति तो दी, लेकिन उन पर तीन शर्तें लगाईं. पहली शर्त थी कि मीना कुमारी शाम साढ़े 6 बजे तक घर लौट आएं. दूसरी शर्त थी कि मीना कुमारी के मेकअप रूम में उनके मेकअप मैन के अलावा कोई पुरुष नहीं बैठेगा और उनकी आखिरी शर्त थी कि मीना कुमारी हमेशा अपनी ही कार में बैठेंगी जो उन्हें स्टूडियो ले कर जाएगी और फिर वापस घर लाएगी.

जिस दिन मीना कुमारी ने कमाल अमरोही की शर्तों पर दस्तख़त किए, उसी दिन से उन्होंने उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया. सबसे पहली घटना तब हुई, जब 'शारदा' की शूटिंग के दौरान राज कपूर ने मीना कुमारी को एक पार्टी में आमंत्रित किया. एक रूसी फ़िल्म प्रतिनिधिमंडल बंबई आया हुआ था. राज कपूर उनके सम्मान में एक स्वागत समारोह कर रहे थे. मीना कुमारी ने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और अपने पति को फ़ोन कर कहा कि वह देर से घर लौटेंगी. उन्होंने इसका कारण राज कपूर की पार्टी नहीं बताया, बल्कि ये कहा कि उनकी शूटिंग देर तक चलेगी. अगले ही दिन इत्तेफ़ाक से कमाल अमरोही की मुलाकात उन मेहमानों से हो गई जो राज कपूर की पार्टी में मौजूद थे. उनसे उन्हें पता चला कि उनकी बीबी शूटिंग में व्यस्त न होकर पार्टी में थीं. जब वह घर लौटीं तो उन्होंने इस बारे में कमाल को कुछ नहीं बताया. बाद में जब कमाल ने उनसे इस हानि रहित धोखे का ज़िक्र किया तो मीना कुमारी ने कहा कि वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थीं.

एक दिन कमाल अमरोही के सचिव बाकर ने मीना कुमारी को अभिनेता प्रदीप कुमार की कार से उतरते हुए देख लिया. बाद में कुछ और घटनाएं हुईं और मीना कुमारी ने ये तय किया कि वह कमाल अमरोही के घर कभी वापस नहीं जाएंगी. कमाल अमरोही के पुत्र ताजदार अमरोही के अनुसार- "मीना कुमारी कमाल के घर से निकलने का बहाना तलाश कर रही थीं ताकि वह आज़ाद पक्षी की तरह रह सकें. जब छोटी अम्मी घर से चली गईं तो बाबा ने एक शौहर होने के नाते अपना फ़र्ज़ निभाया। वह महमूद साहब के यहाँ चली गई थीं. वह वहाँ गए. छोटी अम्मी ने अपने आप को एक कमरे में लॉक किया हुआ था.  बाबा दरवाज़ा पीट कर कहते रहे- 'मंजू बाहर आओ, मुझसे बात करो. तुम्हें क्या शिकायत है. मुझे बताओ.' लेकिन वह बाहर नहीं आईं.

महमूद साहब ने कहा अभी ये नहीं मानेंगी. थोड़ी देर में ये ठंडी हो जाएंगी. आप बाद में इनसे मिलने आ जाइएगा. बाबा ने तीन-चार बार दरवाज़े को ठोका और फिर कहा- 'मंजू तुम अंदर हो और मुझे सुन रही हो. मैं अब जा रहा हूँ. मैं अब लौट कर नहीं आऊँगा. मैंने तुमको मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तुम नहीं मानी. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तुम्हारा मुझ पर कोई हक़ नहीं है. हमारे घर के दरवाज़े हमेशा तुम्हारे लिए खुले हैं और खुले रहेंगे. तुम जब चाहना आ जाना."

इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच की दूरी को पाटने के बजाए और बढ़ा दिया. विनोद मेहता के अनुसार- "सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही दोनों को 'इरोज़' सिनेमा में एक फ़िल्म प्रीमियर पर आमंत्रित किया. सोहराब ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से मीना कुमारी का परिचय कराते हुए कहा- 'ये मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी हैं और ये इनके पति कमाल अमरोही हैं. ' इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को नमस्ते कहते, अमरोही ने कहा- 'नहीं, मैं कमाल अमरोही हूँ और ये मेरी पत्नी हैं. मशहूर फ़िल्म अदाकारा मीना कुमारी. ' इतना कह कर वह सिनेमा हॉल से बाहर चले गए और मीना कुमारी को अकेले बैठकर वह फ़िल्म देखनी पड़ी. "

मीना कुमारी की पूरी ज़िंदगी सिनेमा के पर्दे पर भारतीय औरत की 'ट्रैजेडी' को उतारते हुए गुज़री. यहाँ तक कि उन्हें अपनी ख़ुद की निजी ट्रैजेडी के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिला. लेकिन ये कहना कि मीना कुमारी के अभिनय में 'ट्रैजेडी' के अलावा और कोई 'शेड' नहीं था, उनके साथ बेइंसाफ़ी होगी. फ़िल्म 'परिणिता' की शांत बंगाली अल्हड़ नवयौवना को लें, या 'बैजू बावरा' की चंचल हसीन प्रेमिका को लें या फिर 'साहब बीबी और गुलाम' की सामंती अत्याचार झेलने वाली बहू हो या 'पाकीज़ा' की साहबजान, सभी ने भारतीय जनमानस के दिल पर अमिट छाप छोड़ी है. 
मीना कुमारी एक अभिनेत्री के रूप में 32 सालों तक भारतीय सिने जगत पर छाई रहीं.  बेहद भावुक और सदा दूसरों की मदद करने को तत्पर मीना कुमारी की ज़िंदगी दूसरों को सुख बांटते और दूसरे के दु:ख बटोरते हुए बीती थी. कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही के अनुसार- "मीना कुमारी को कभी ख़ूबसूरत चेहरे के तौर पर लोगों ने नहीं एडरेस किया, जैसा कि मधुबाला को कहा गया- 'वीनस ऑफ़ द इंडियन स्क्रीन', नरगिस के लिए भी लोगों ने कहा- 'फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन स्क्रीन'. मीना को ख़िताब मिला 'ट्रेजेडी क्वीन' का और उन्होंने 'ट्रेजेडी' को अपना ओढ़ना, बिछौना बना लिया. लोगों ने समझा कि वह जैसे किरदार फ़िल्मों में कर रही हैं, असल ज़िंदगी में भी वह वही भूमिका निभा रही हैं. दिलचस्प बात ये थी कि लोगों के साथ-साथ ख़ुद उन्होंने भी ऐसा समझना शुरू कर दिया था. 

वर्ष 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म 'शारदा' में मीना कुमारी के अभिनय के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले. इस फ़िल्म में मीना कुमारी ने अभिनेता राजकपूर की प्रेयसी के अलावा उनकी सौतेली माँ की भूमिका भी निभाई. हालांकि उसी वर्ष फ़िल्म 'मदर इंडिया' के लिए फ़िल्म अभिनेत्री नर्गिस को सारे पुरस्कार दिए गए, लेकिन 'बॉम्बे जर्नलिस्ट एसोसिएशन' ने मीना कुमारी को उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामित किया. 

कमाल अमरोही और मीना कुमारी भले ही पति और पत्नी के रूप में एक-दूसरे से अलग रहे हों, लेकिन अभिनेत्री के तौर पर वह हमेशा कमाल अमरोही की फ़िल्मों में काम करने के लिए उपलब्ध थीं. यही वजह है कि अमरोही से 5 सालों तक अलग रहने के बावजूद उन्होंने उनकी फ़िल्म 'पाकीज़ा' की शूटिंग पूरी करने का फ़ैसला किया. जिस तरह से शाहजहाँ ने ताजमहल बनाकर मुमताज़ महल को हमेशा के लिए अमर कर दिया, वैसे ही कमाल अमरोही ने 'पाकीज़ा' बनाकर मीना कुमारी के लिए ताजमहल खड़ा किया और उनको अमर कर दिया. जब-जब भारतीय फ़िल्मों का इतिहास लिखा जाएगा, 'पाकीज़ा' का ज़िक्र ज़रूर होगा. इस फ़िल्म में योगदान राज कुमार साहब का भी है, अशोक कुमार का भी है और नादिरा का भी है, लेकिन तीन नाम हमेशा ज़िंदा रहेंगे- मीना कुमारी, कमाल अमरोही और पाकीज़ा.  वर्ष 1972 में जब 'पाकीज़ा' प्रदर्शित हुई तो फ़िल्म में मीना कुमारी के अभिनय को देखकर दर्शक मुग्ध हो गए और यह फ़िल्म आज भी मीना कुमारी के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है. 

मीना कुमारी के सिनेमा कैरियर में उनकी जोड़ी फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार के साथ काफ़ी प्रसिद्ध रही. मीना कुमारी और अशोक कुमार की जोड़ी वाली फ़िल्मों में 'तमाशा', 'परिणीता', 'बादबान', 'बंदिश', 'भीगी रात', 'शतरंज', 'एक ही रास्ता', 'सवेरा', 'फरिश्ता', 'आरती', 'चित्रलेखा', 'बेनज़ीर', 'बहू बेग़म', 'जवाब' और 'पाकीज़ा' जैसी फ़िल्में शामिल हैं. हिन्दी फ़िल्म जगत् में 'ट्रेजेडी क्वीन' कही जानी वाली मीना कुमारी की जोड़ी 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार के साथ भी काफ़ी पसंद की गई. मीना कुमारी और दिलीप कुमार की जोड़ी ने 'फुटपाथ', 'आज़ाद', 'कोहिनूर' और 'यहूदी' जैसी फ़िल्मों में एक साथ काम किया. 

अभिनय में आई एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेत्री के रूप में स्थापित करने के लिए मीना कुमारी ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया. इसके बाद मीना कुमारी ने चरित्र भूमिका वाली 'जवाब' और 'दुश्मन' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के जरिए भी दर्शकों के दिल पर राज किया. वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिनेमा कॅरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ. इस वर्ष उनकी 'आरती', 'मैं चुप रहूंगी' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं.  इसके साथ ही इन फ़िल्मों के लिए वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए नामित की गईं. यह 'फ़िल्मफेयर' के इतिहास में पहला ऐसा मौक़ा था, जहाँ एक अभिनेत्री को 'फ़िल्मफेयर' के तीन वर्गों में नामित किया गया था. 

सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार

मीना कुमारी को मिले सम्मानों की चर्चा की जाए तो उन्हें अपने अभिनय के लिए चार बार 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'परिणीता' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार दिया गया. इसके बाद वर्ष 1954 में भी फ़िल्म 'बैजू बावरा' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद मीना कुमारी को 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए लगभग 8 वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ा और वर्ष 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'साहिब बीबी और ग़ुलाम' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' मिला. इसके बाद वर्ष 1966 में फ़िल्म 'काजल' के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित की गईं. 

मीना कुमारी को फिल्म इंडस्ट्री में 'ट्रेजेडी क्वीन' का दर्जा मिला. फिल्मों के साथ-साथ असल जिंदगी में भी उनके साथ कई दु:खद हादसे हुए. जाने-माने उर्दू शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बार मुशायरा छोड़ दिया था, क्योंकि उन्होंने देखा कि उसमें अभिनेत्री मीरा कुमारी शामिल हो रही हैं. उनका कहना था कि मुशायरे सिर्फ शायरों की जगह हैं. यह वाकया 1959-1960 का है, जब फ़िराक़ गोरखपुरी को एक मुशायरे में आमंत्रित किया गया था. फ़िराक़ गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था. ‘फिराक गोरखपुरी: द पोयट ऑफ पेन एंड एक्सटैसी’ नामक पुस्तक में इस वाकये का जिक्र किया गया है. फ़िराक़ की इस जीवनी के लेखक उनके रिश्तेदार अजय मानसिंह थे. 

जब फ़िराक़ मुशायरा स्थल पर पहुंचे तो उनका तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया गया और मुशायरे की शुरुआत पूरे जोशो-खरोश के साथ हुई. करीब एक घंटे के बाद वहां ऐलान किया गया कि मौके पर अदाकारा मीना कुमारी पहुंच चुकी हैं. मुशायरे में शामिल लोग शायरों को मंच पर छोड़कर मीना कुमारी की झलक पाने के लिए भागे. इससे नाराज़ फ़िराक़ गोरखपुरी ने मौके से जाने का फैसला किया. इस पर आयोजक उन्हें मनाने की कोशिश में जुट गए. मीना कुमारी ने भी शर्मिंदगी महसूस की और फ़िराक़ से बार-बार गुजारिश की कि वह रुकें. मीना कुमारी ने उनसे कहा, "जनाब, मैं आपको सुनने के लिए आई हूं. " फ़िराक़ ने इस पर तुरंत जवाब दिया, "मुशायरा मुजरा बन चुका है.  मैं ऐसी महफिल से ताल्लुक नहीं रखता. "

इसके एक दिन बार फ़िराक़ गोरखपुरी ने कहा, "मैं मीना कुमारी की वजह से वहां से नहीं हटा था. आयोजकों और दर्शकों के व्यवहार के कारण वहां से हटा, जिन्होंने हमारी बेइज्जती की थी. " उनकी दलील थी कि "मुशायरा शायरी का मंच है. यहां के कलाकार सिर्फ शायर होते हैं और यहां की व्यवस्था में एक पदानुक्रम होता है जिसका पालन किया जाना चाहिए.  

फ़िल्म 'पाकीज़ा' की शूटिंग के दौरान कमाल अमरोही और मीना कुमारी के साथ एक दिलचस्प घटना घटी. मशहूर पत्रिका 'आउटलुक' के संपादक रहे विनोद मेहता ने मीना कुमारी की जीवनी 'मीनाकुमारी- ए क्लासिक बायोग्राफ़ी' नाम से लिखी है, उनके अनुसार- 'आउटडोर शूटिंग पर कमाल अमरोही अक्सर दो कारों पर जाया करते थे. एक बार दिल्ली जाते हुए मध्य प्रदेश में शिवपुरी में उनकी कार में पैट्रोल ख़त्म हो गया. कमाल अमरोही ने कहा कि 'हम रात कार में सड़क पर ही बिताएंगे.'

उनको पता नहीं था कि ये डाकुओं का इलाका है. आधी रात के बाद करीब एक दर्जन डाकुओं ने उनकी कारों को घेर लिया. उन्होंने कारों में बैठे हुए लोगों से कहा कि वह नीचे उतरें. कमाल अमरोही ने कार से उतरने से इंकार कर दिया और कहा कि 'जो भी मुझसे मिलना चाहता है, मेरी कार के पास आए.' थोड़ी देर बाद एक सिल्क का पायजामा और कमीज़ पहने हुए एक शख़्स उनके पास आया. उसने पूछा- 'आप कौन हैं?' अमरोही ने जवाब दिया- 'मैं कमाल हूँ और इस इलाके में शूटिंग कर रहा हूँ. हमारी कार का पैट्रोल ख़त्म हो गया है. ' डाकू को लगा कि वह रायफ़ल शूटिंग की बात कर रहे हैं.  लेकिन जब उसे बताया गया कि ये फ़िल्म शूटिंग है और दूसरी कार में मीना कुमारी भी बैठी हैं, तब उसके हावभाव बदल गए. उसने तुरंत संगीत, नाच और खाने का इंतज़ाम कराया. उन्हें सोने की जगह दी और सुबह उनकी कार के लिए पेट्रोल भी मंगवा दिया. चलते-चलते उसने मीना कुमारी से कहा कि वह नुकीले चाकू से उसके हाथ पर अपना ऑटोग्राफ़ दे दें. जैसे-तैसे मीना कुमारी ने ऑटोग्राफ़ दिए. अगले शहर में जाकर उन्हें पता चला कि उन्होंने मध्य प्रदेश के उस समय के नामी डाकू अमृत लाल के साथ रात बिताई थी. 

शराब पीने और तंबाकू खाने की लत ने मीना कुमारी के स्वास्थ्य को इतनी बुरी तरह से बिगाड़ा कि वह इससे कभी उबर नहीं पाईं. उनके अंतिम दिनों के साथी और उनकी आख़िरी फ़िल्म 'गोमती के किनारे' के निर्देशक सावन कुमार टाक के अनुसार- "6 दिनों तक तो मेरी फ़िल्म बहुत अच्छी बनी. इसके बाद वह बीमार पड़ गईं.  उनका हमेशा ज़ोर रहता था कि किसी भी हालत में फ़िल्म की शूटिंग न रोकी जाए. " हमारा ऐसा भावनात्मक रिश्ता हो गया था कि हम एक-दूसरे को तकलीफ़ देने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. मीना जी इतनी कमज़ोर हो गई थीं कि शॉट देते समय वह गिर सकती थीं. लोगों को पता नहीं है कि जब वह अभिनय कर रही होती थीं तो मैं उन्हें पीछे से पकड़े हुए होता था और शॉट के बाद उन्हें कुर्सी पर बैठा देता था. मैं उनका एहसानमंद हूँ कि उन्होंने मुझे डायरेक्टर बनाया. उनकी शर्त थी कि अगर तुम फ़िल्म निर्देशित करोगे, तभी मैं ये फ़िल्म करूंगी. "

अपने आख़िरी दिनों में मीना कुमारी को 'सेंट एलिज़ाबेथ नर्सिंग होम' में भर्ती कराया गया था. नर्सिंग होम के कमरा नंबर 26 में उनके आख़िरी शब्द थे- "आपा, आपा, मैं मरना नहीं चाहती." जैसे ही उनकी बड़ी बहन ख़ुर्शीद ने उन्हें सहारा दिया, वह कोमा में चली गईं और फिर उससे कभी नहीं उबरीं. लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस महान् अभिनेत्री मीना कुमारी का निधन 31 मार्च, 1972 को हुआ.

वे संवेदनशील दिल की मलिका थी उनका असल नाम महजबीं नाज़ था, मगर शायरी में उन्‍होंने 'नाज़' तख़ल्‍लुस ही चुना था. उनकी लिखी यह ग़ज़ल मानों उनकी जिन्दगी की ही तर्जुमानी करती है-

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा

लेखक: रजनीकांत शुक्ल

Published at:01 Aug 2022 05:11 PM (IST)
Tags:News
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