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बिहार में क्यों उठ रही है शराबबंदी की जमीनी हकीकत जानने की मांग,क्या पलटने वाला है नीतीश कुमार का निर्णय

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: April 29, 2026, 2:21:35 PM

TNP DESK- बिहार में शराबबंदी को लेकर एक नया विवाद और डिमांड छिड़ गया है .कोई इसके पक्ष में है तो कोई विरोध में. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते हुए शराबबंदी कानून की समीक्षा करने की मांग उठ रही थी. यह अलग बात है कि जदयू के नेता हमेशा इसे खारिज करते रहे. लेकिन एक बार फिर शराबबंदी कानून बिहार की राजनीति की चर्चा के केंद्र में है. 

2016 से बिहार में शराबबंदी कानून लागू है. लेकिन इस कानून की आड़ में एक नई संस्कृति का जन्म हुआ है,यह भी जमीनी सच्चाई है. शराब तो बिहार में बिक ही रही है. सूखे नशा का कारोबार बढ़ गया है. पुलिस भी जब सक्रिय होती है, तो बिहार में शराब की बड़ी खेप पकड़ी जाती है. यह खेप यह बताती है कि बिहार में शराबबंदी के बावजूद खपत बनी हुई है .

ऐसे में उपमुख्यमंत्री के एक बयान पर समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि विजेंदर भाई उप मुख्यमंत्री के साथ साथ कई विभागों के भी मंत्री हैं. उनमें एक विभाग मद्य निषेध भी है. अख़बार में उनका एक बयान देखा. जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि शराब बंदी क़ानून को वापस लेने पर सरकार क्या विचार कर रही है. उनका जवाब था कि इंग्लैंड में भी जो क़ानून बनता है, उसका भी उल्लंघन होता है . इसलिए क़ानून वापस नहीं लिया जाता है.

विजेंदर भाई को एक जानकारी देना चाहूंगा. 1920 में अमेरिका में भी शराब बंदी क़ानून लागू हुआ था. लेकिन 1933 में उसको वापस लेना पड़ा. अवैध शराब के कारोबार में शक्तिशाली अपराधी गिरोहों का उदय हो गया. वहाँ अपराधियों का गिरोह कैसे काम करता , उस पर मारियो पूजो का लिखा 'गॉड फादर' उपन्यास है, जिस पर फिल्म भी बनी है. दुनिया भर में अच्छे मक़सद के लिए क़ानून बनाए जाते हैं. लेकिन अगर उक्त क़ानून से वह मक़सद हासिल नहीं होता है, तो उसमें संशोधन करने या उसे वापस लेना अपमानजनक नहीं बल्कि बुद्धिमानी का काम माना जाता है. 

यहां बिहार में जो नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद मौजूदा मद्य निषेध क़ानून कैसे बना, उसका संदर्भ क्या था, यह जानना बहुत दिलचस्प है. नीतीश कुमार जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सरकार का राजस्व बढ़ाने का अभियान चलाया. उस समय उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग से राज्य को लगभग 300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था.कुछ ही वर्षों में यह बढ़कर 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यह बढ़ोतरी अपने आप में नज़ीर है कि नीतीश जी ने बिहार में किस हद तक शराब को बढ़ावा दिया. गांव-गांव में भट्टियां खुलीं, और सामाजिक हालात ऐसे बने कि महिलाओं का घर से निकलना तक मुश्किल होने लगा.

जब महिलाओं का व्यापक विरोध सामने आया, तब शुरुआत में नीतीश जी की ओर से यही तर्क दिया गया कि लड़कियों के लिए साइकिल, पोशाक और अन्य योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा .

लेकिन अचानक एक दिन नीतीश जी के अंतर में सोए गांधी जी जागे. उन्होंने बिहार में देशी शराब को प्रतिबंधित कर दिया. इस फ़ैसले के लिए विशेषज्ञों की कोई कमिटी नहीं बनी. राजस्व की हानि होगी तो उसकी भरपाई कैसे होगी, इस पर कोई विचार नहीं हुआ. यहाँ तक कि इस निर्णय पर पहुँचने के लिए विभाग की भी कोई कमिटी नहीं बनायी गई. इस मामले में नीतीश कुमार का बर्ताव एक राजा की तरह था. जिस तरह शराब बंदी क़ानून पर नीतीश जी ने निर्णय लिया ,वह भी साबित करता है कि वह कोई सुविचारित और सुचिंतित निर्णय नहीं था. 

पहले देसी शराब पर प्रतिबंध लगाया गया, और कुछ ही दिनों बाद संपूर्ण शराबबंदी की घोषणा कर दी गई. इस घटनाक्रम में कोई सुविचारित नीति नहीं दिखाई देती है. बल्कि यह एक तात्कालिक और मनमाना निर्णय जैसा था.

इसलिए आज ज़रूरत किसी के बचाव या कोई उदाहरण देने की नहीं है, बल्कि ईमानदार आत्ममंथन की है. सरकार को चाहिए कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष कमेटी गठित करे, जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के जमीनी सच्चाई का अध्ययन करे और स्पष्ट रूप से बताए कि शराबबंदी अपने उद्देश्य में कितनी सफल रही है या इसमें किसी संशोधन की ज़रूरत है! उसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की नीति तय होनी चाहिए.

रिपोर्ट धनबाद ब्यूरो 

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