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2024 का जंग- कोडरमा में अन्नपूर्णा पर संशय! इंडिया गठबंधन में भी पहलवान की खोज जारी

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 5:36:17 AM

रांची(RANCHI)- जैसे-जैसे 2024 का महाजंग नजदीक आता दिख रहा है, कोडरमा की राजनीति में अन्दरखाने बेचैनी तेज होती जा रही है, जहां एनडीए खेमे में इस बात की चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि भाजपा इस बार अपने प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल को चुनावी समर में उतार कर अन्नपूर्णा देवी के सामने राजनीतिक संकट खड़ा कर सकती है. वहीं दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन में भी 2024 के सियासी पहलवानों पर मशक्कत जारी है.  
यहां ध्यान रहे कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बाबूलाल कोडरमा संसदीय सीट से जेवीएम (पी) के बैनर तले मैदान में थें. लेकिन तब राजद का लालटेन छोड़कर कमल पर सवार हुई अन्नपूर्णा देवी ने करीबन चार लाख मतों से भाजपा के इस पूर्व कदावर नेता को पटकनी दिया था.

कोडरमा संसदीय सीट पर भाजपा की रही है मजबूत पकड़

यहां ध्यान रहे कि कोडरमा संसदीय सीट को भाजपा का गढ़ माना जाता है, पहली बार वर्ष 1989 में पूर्व सांसद आरएलपी वर्मा ने यहां से भाजपा को जीत दिलवाया था, लेकिन वर्ष 1991 में जनता दल के मुमताज अंसारी ने एक बार फिर से जीत का परचम लहराया दिया. लेकिन 1996 के लोकसभा चुनाव में आरएलपी वर्मा ने एक बार फिर से भाजपा का झंडा बुंलद कर दिया. और 1998 में भी इस जीत को बरकरार रखा. लेकिन 1999 में यह सीट कांग्रेस ने अपने नाम कर लिया, तब इस सीट पर तिलकधारी सिंह ने कब्जा जमाया था.

बाबूलाल की इंट्री

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर बाबूलाल की इंट्री होती है. और वह एक बार फिर से भाजपा का झंडा फहराने में कामयाब रहते हैं. लेकिन 2006 के चुनाव में एक बार फिर से भाजपा को झटका लगा, यह सीट तो बाबूलाल के नाम ही रही, लेकिन तब तक वह भाजपा छोड़ चुके थें. और बाबूलाल ने यही करिश्मा 2009 के लोकसभा चुनाव में दिखलाया. जब वह अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के बनैर तले इस सीट को अपने नाम किया था. लेकिन 2014 में भाजपा के रवीन्द्र कुमार रे ने बाबूलाल को सियासी पटकनी दे दी और यह सीट एक बार फिर से भाजपा के नाम कर दिया.

मोदी की आंधी में अन्नपूर्णा ने बाबूलाल को दी थी पटकनी

इधर जब 2014 में मोदी की आंधी बह रही थी, तब भाजपा ने राजद का लालटेन छोड़कर कमल पर सवाल हुई अन्नपूर्णा देवी को पार्टी छोड़ने का इनाम दिया और कोडरमा सीट से उन्हे उम्मीदवार बना दिया और तब अन्नपूर्णा ने करीबन चार लाख मतों बाबूलाल को पटकनी दे दी थी.

अब वही बाबूलाल सियासत के मैदान में अन्नपूर्णा के सामने दीवार बन कर खड़े हैं

लेकिन अब बदले सियासी समीकरण में भाजपा अन्नपूर्णा को आराम देना चाहती है, प्रदेश अध्यक्ष के रुप में ताजपोशी के बाद एक बार फिर से बाबूलाल का सियासी में इजाफा हुआ है और वह सियासत की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं. जहां तक इंडिया गठबंधन का सवाल है तो इस सीट के लिए कई नामों पर चर्चा जारी है, इन नामों में सबसे अधिक चर्चा भाजपा छोड़ झामुमो में शामिल हुए गांडेय के पूर्व विधायक जयप्रकाश वर्मा का नाम है.

इंडिया गठबंधन से सियासी अखाड़े में उतर सकते हैं जयप्रकाश वर्मा
 
यदि हम कोडरमा संसदीय सीट का सामाजिक समीकरण पर गौर करें तो यहां सबसे अधिक यादव जाति के मतदाता हैं, जिनकी अनुमानित संख्या करीबन तीन लाख बतायी जाती है, जबकि मुस्लिम आबादी भी करीबन ढाई लाख के आसपास है, वहीं सवर्ण मतदाताओं के लिए भी करीबन ढाई लाख का दावा किया जाता है,  इसके साथ ही कुशवाहा और कुर्मी मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है.

सीपीआई एमएल के राजकुमार यादव भी साबित हो सकते हैं तुरुप का पत्ता

इन सभी आंकडों के बीच यहां भी ध्यान रखना होगा कि सीपीआई एमएल के राजकुमार यादव भी यहां से सियासी मैदान में उतरते रहे हैं, और अच्छी खासी संख्या में यादव मतदाताओं का वोट काटते रहे हैं, जिसका लाभ किसी ना किसी रुप में भाजपा को मिलता रहा है, लेकिन इस बार जब मुकाबले में इंडिया गठबंधन होगा तब माना जा रहा है कि राजकुमार यादव चुनावी मुकाबले में नहीं होंगे, जिसका सीधा लाभ इंडिया गठबंधन को सकता है.

हालांकि चर्चा यह भी है कि इंडिया गठबंधन के अन्दर उनके नाम पर भी विचार हो रहा है. वैसे सियासी जानकारों का दावा है कि इंडिया गठबंधन की ओर से इस बार झामुमो जयप्रकाश वर्मा का नाम तय है. लेकिन यदि भाजपा अन्नपूर्णा को मैदान में उतारने का फैसला करती है तो राजकुमार यादव के नाम पर भी विचार हो सकता है.

भाजपा को अन्नपूर्णा को हटाने का हो सकता है नुकसान  

बाबूलाल के नाम पर चर्चा और कोडरमा में उनके जीत का इतिहास के बावजूद यह ध्यान रखना होगा कि यदि भाजपा अन्नपूर्णा देवी को मैदान से हटाने का फैसला करती है, उसके सामने तीन लाख यादव मतों को अपने साथ खड़ा रखने की चुनौती होगी, और इसके साथ ही इंडिया गठबंधन के लिए यह बेहद आसान मोर्चा साबित हो सकता है. क्योंकि बिहार से उठे जातीय जनगणना की सियासी तपिश से आज झारखंड भी अछूता नहीं है.

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