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ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन...... अफ्रीकी सौन्दर्य में पागल बिहारी इंजीनियर

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 12:46:40 AM

                       होंठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो,
                      बन जाओ मीत मेरे मेरी प्रीत अमर कर दो,

                       तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो
                      होंठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो.....

TNP DESK-मशहूर गीतकार इन्दीवर ने जब इन शब्दावलियों को लीपिबद्ध किया और गजल की दुनिया के बेताज बादशाह माने जाने वाले जगजीत सिंह ने जब इन पंक्तियों को अपनी आवाज दी तो देखते देखते यह युवाओं का सबसे पंसदीदा अफसाना बन गया. इसकी चंद लाइनें युवाओं के सिर चढ़ कर बोलने लगा. हालांकि इस बीच काफी कुछ बदला, समाज की परंपरा भी बदली, और उसकी संरचना में भी बदलाव-विखराव आया और सबसे बड़ी बात प्रेम-एहसास के मायने भी बदले गयें. आज की रेडीमेट फूड के शौकीन युवा पीढ़ी का प्रेम की परिभाषा भी बदल गयी. उनके लिए यह पवित्र प्रेम महज एक दैहिक आकर्षण बन कर रह गया. समर्पण, त्याग और उत्कर्ष जैसी शब्दावलियों का इस युवा पीढ़ी के लिए कोई महत्व नहीं था. बावजूद इसके आज भी जब कहीं भी प्रेम का अंकुरण होता है, उसका एहसास होता है, धड़कने तेज होती है, चाहतें आसमान छूने लगता है, बेकरारी और तड़प सीने में उछाल लेने लगता है तो उस तड़प को अभिव्यक्त करने के लिए इन्दीवर का यह दर्द ही सहारा बन कर सामने आता है. और इन्ही चंद पंक्तियों के सहारे वह दुनिया को अपनी तड़प का एहसास करवाता है.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर  को  भाया विदेशी बाला

कुछ ऐसी ही कहानी है बिहार के पश्चिम चंपारण जिला के रहने वाल अमित कुमार और दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग की रहने वाली किम मोलेनार की.  रामनगर के आर्य नगर के रहने वाले पीएमवीएस कॉलेज के प्रो. प्रफुल्ल चंद्र ठाकुर को जब इस बात की जानकारी मिली कि जिस बेटे को उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रुप में काम करने के लिए साउथ अफ्रीका भेजा था, उसकी आंखों में अब एक सपना दिख रहा है, यह वह सपना है जो दिन हो रात हर वक्त उसकी आंखों के सामने घूमता रहता है, और बेकरारी की रफ्तार यह है कि यदि बेटे अमित से सपने  के बीच वह या उनका परिवार आया तो अमित अपनी जिंदगी का मकसद खो सकता है, और उसके बाद परिवार में बहस तेज हो गयी, इसके पक्ष विपक्ष में दलीलों का प्रवाह तेज हो गया, एक तरफ भारतीय परंपरा थी तो दूसरी तरफ अफ्रीकी सौन्दर्य था. दोनों की भाषा, संस्कृति और पंरपरा अलग थी, लेकिन आखिरकार प्रो. प्रफुल्ल चंद्र ठाकुर ने दो युगल जोड़ियों के बीच खलनायक बनने से इंकार कर दिया, और जैसे ही जोहान्सबर्ग में अमित को अपने पिता के इस फैसले की जानकारी मिली उसकी नजर में प्रफुल्ल चंद्र ठाकुर मानवीय संवेदना के पैरोकार नजर आने लगें, और इसके बाद महज चंद दिनों में ही अमित और किम मोलेनार ने भारत का रुख कर लिया.  

भारत आते ही रामनगर शहर में पूरे धूम धाम के साथ शादी की तैयारी शुरु हो गयी, लेकिन लोगों की आंख तब खुली रह गयी जब अमित भारतीय परंपरा के अनुसार एक घोड़ी पर सवार होकर फूलों का हार लिए किम मोलेनार के सामने आया. किम मोलेनार तो इसकी कल्पना भी नहीं की थी. खैर, घोड़ी से उतर अमित ने  जैसे ही किम के साथ जन्म जन्मान्तर तक एक दूसरे का साथ निभाने का कसम दुहराया. लोग बरबस तालियां बजाने को मजबूर हो गयें.

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