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हेराफेरी के धंधे में भी होती है इतिहास की समझ की जरुरत, देखिये इतिहास की इसी अज्ञानता से कैसे खुली भू माफियाओं की पोल

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 5:36:26 AM

रांची(RANCHI)- वैसे तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इस दौर में इतिहास की बेसिक समझ बात आज बेमानी हो गयी है. व्हाट्सएप पर एक खबर आई नहीं कि उसे अंतिम ब्रह्म वाक्य मान किचड़ उछालने की शुरुआत हो जाती है, लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का यह ज्ञान कई बार जानलेवा भी साबित होता है, और कई बार इसकी अज्ञानता के कारण हेराफेरी के धंधे में भी नुकसान उठाना पड़ जाता है. 

किसी भी पेशे में जाने के पहले इतिहास की समझ पैदा करने की जरुरत

आपका पेशा कोई भी हो, आप नीति निर्माता हों या हेराफेरी ही आपका मुख्य धंधा हो, लेकिन इतिहास में यह हेराफेरी या उसकी अज्ञानता आपको मुसीबत में डाल सकती है.
कुछ ऐसा ही हुआ है सेना की जमीन की बिक्री करने वाले जमीन दलालों के साथ. रांची के बरियातू स्थित 4.55 एकड़ की जिस जमीन को भू माफिया प्रदीप बागची ने कोलकाता के जगतबंधु टी इस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक दिलीप कुमार घोष को बेची थी, अब उसकी गड़बड़शाला की परतें खुलने की शुरुआत हो चुकी है, और उसकी शुरुआत महज इतिहास की एक अज्ञानता के कारण हो गयी.  

क्या 1932 में कोलकत्ता पश्चिम बंगाल का हिस्सा था?

दरअसल प्रदीप बागची का दावा है कि उसके पिता ने इस जमीन को उसके मूल रैयतों से 1932 में खरीदी थी, जिसका निंबधन कोलकता निंबधन कार्यालय में करवाया गया था, लेकिन उक्त जमीन के दस्तावेज में कोलकत्ता को पश्चिम बंगाल का हिस्सा दिखलाया गया है. अब सवाल यह है कि 1932 में तो सिर्फ और सिर्फ बंगाल ही था, पश्चिम बंगाल का अस्तित्व को भारत विभाजन के बाद 1947 में आया. जब बंगाल को दो टूकड़ों में विभाजित कर एक हिस्सा पाकिस्तान को दिया गया, तो दूसरा हिस्सा भारत में रहा, अखंड बंगाल के इसी हिस्से की पहचान भारत में पश्चिम बंगाल के रुप में हुई.

पिन कोड की शुरुआत 1972 में हुई, तो दस्तावेज में इसका जिक्र कैसे हुआ?

अब सवाल यह है कि जमीन के दस्तावेज में कोलकता को पश्चिम बंगाल का हिस्सा किस ऐतिहासिक आधार बताया गया. इसके साथ ही जमीन के दस्तावेज में क्रेता विक्रेता और गवाहों के पते की पहचान के लिए पिन कोड का उल्लेख किया गया है. जबकि पिन कोड की शुरुआत ही हुई है 15 अगस्त 1972 को. यह ऐतिहासिक चमत्कार को कैसे अंजाम दिया गया?

जमीन के दस्तावेज में भोजपुर जिले की चर्चा कैसे?

इसके साथ ही जमीन के दस्तावेज में एक और रोचक तथ्य और इतिहास की हेराफरी है. दस्तावेज में गवाहों को बिहार के भोजपुर जिले का बताया गया है, अब 1932 में भोजपुर जिला के रुप में अस्तित्व में आया ही नहीं था, एक जिला के रुप में भोजपुर 1972 में अस्तित्व में आया,  इसके पहले यह शाहाबाद जिला का हिस्सा था. वर्ष 1972 में शाहाबाद को दो हिस्सों में बांटकर भोजपुर और रोहतास का निर्माण किया गया. जमीन के दस्तावेज में ऐतिहासित तथ्यों के साथ इतनी छेड़छाड़ सिर्फ  इसलिए ही तो किया गया, क्योंकि भू माफिया प्रदीप बागची को इतिहास की बेसिक समझ नहीं थी.  

Tags:need for understanding of historyटी इस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक दिलीप कुमार घोषसेना की जमीनरांचीप्रदीप बागचीईडीछवि रंजनव्हाट्सएप यूनिवर्सिटी

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