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जातीय जनगणना के सवाल पर मोदी सरकार को घेरने की गोलबंदी तेज! कर्नाटक चुनाव के बाद पटना में विपक्षी दलों की बड़ी बैठक, समझिये इसके सियासी मायने

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 9:05:07 AM

पटना(PATNA)-जातीय जनगणना के सवाल पर नीतीश कुमार को घेरने की तमाम कोशिशों के बीच 2024 के लोकसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी शुरु हो चुकी है, कर्नाटक चुनाव समाप्त होते ही जातीय जनगणना के मुद्दे पर पटना में देश की सभी विपक्षी और क्षेत्रीय दलों की एक बड़ी बैठक आयोजित करने की तैयारियां शुरु हो चुकी है.

सुप्रीम कोर्ट में जातीय जनगणना से इंकार कर चुकी है केन्द्र सरकार

ध्यान रहे कि केन्द्र की मोदी सरकार जातीय जनगणना के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख साफ करते हुए कहा है कि केन्द्र सरकार जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं है. जबकि बिहार में भाजपा के द्वारा जातीय जनगणना का समर्थन का दावा किया जा रहा है. हालांकि विरोधी दलों का तर्क है कि यदि भाजपा जातीय जनगणना का इतना ही समर्थन है, तो वह पूरे देश में जातीय जनगणना क्यों नहीं करवाती है? आखिर विभिन्न राज्यों के द्वारा इसे टूकड़ों-टूकड़ों में करवाने की नौबत क्यों आ रही है? उनका आरोप है कि भाजपा इस मुद्दे पर दोहरी राजनीति कर रही है, एक तरफ वह अपने को जातीय जनगणना का समर्थक पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद करने की साजिश करती है तो दूसरी ओर देश की सर्वोच्च अदालत में जातीय जनगणना से इंकार कर जाती है, सुप्रीम कोर्ट में उसके स्टैंड से उसका चेहरा साफ हो गया है, पिछड़ी जातियां अब उसके बहकावे में आने वाली नहीं है, यह भाजपा की दोहरी राजनीति का ही नतीजा है कि जातीय जनगणना की राह में वह कानूनी अड़चनें पैदा करने के लिए अपने लोगों को अदालतों में भेजती है. ताकि यह कानूनी लड़ाई में तब्दील हो जाय.

 दर्जनों दलों का मिल सकता है समर्थन

ध्यान रहे कि जातीय जनगणना के मुद्दे पर नीतीश कुमार के साथ ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव, नवीन पटनायक, झारखंड सीएम हेमंत सोरेन, तमिलानाडू सीएम स्टालिन के साथ ही दर्जनों क्षेत्रीय दलों की राय लगभग एक है, उनके द्वारा पूरे जोर शोर से इस मुद्दे को उठाया जा रहा है. अब उनकी कोशिश इस मुद्दे को 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले एक बड़ा सियासी मुद्दा बनाने की है.

 कई राज्यों में बन चुका है यह बड़ा सियासी मुद्दा

ध्यान रहे हालिया दिनों में कई राज्यों में जातीय जनगणना बड़ा सियासी मुद्दा बन कर सामने आया है. बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उतरप्रदेश, तमिलनाडू में जातीय जनगणना के मुद्दे पर गोलबंदी तेज हो चुकी है. इस बीच ओडिशा की सरकार ने जातियों की गिनती शुरु भी कर दी है, जबकि इसके पहले कर्नाटक में सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण कर जातीयों की संख्या जानने को कोशिश की गयी थी, हालांकि राज्य की भाजपा सरकार के द्वारा  अब तक उसके आंकडों को सार्वजनिक नहीं की गयी

जातीय जनगणना की मांग को कांग्रेस का समर्थन

खबर यह भी है कांग्रेस जातीय जनगणना के मुद्दे पर खुद फ्रंट पर नहीं आकर दूसरे क्षेत्रीय दलों को आगे कर इसका समर्थन करेगी. जिससे कि यह मुद्दा 2024 के पहले राजनीति का केन्द्र बन कर उभरे और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी जो अब तक भाजपा के इर्द गिर्द घूमती रही है, वह टूट सके.    

Tags:Modi governmentcaste censusBig meeting of opposition partiesKarnataka electionsजातीय जनगणना बड़ा सियासीअखिलेश यादवनवीन पटनायकझारखंड सीएम हेमंत सोरेनतमिलानाडू सीएम स्टालिन

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