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मॉब लिंचिंग बिल पर सत्ता पक्ष की बैटिंग तो सुभाष मुंडा की हत्या पर बवाल काटने की तैयारी में विपक्ष, देखिये कितना हंगामेंदार रहेगा मानसून सत्र

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 11, 2026, 7:19:38 AM

रांची(RANCHI)- मानसून सत्र से ठीक पहले सुभाष मुंडा की हत्या ने विपक्ष के हाथों में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा थमा दिया है, अब विपक्ष की कोशिश राजधानी रांची सहित राज्य के दूसरे हिस्सों में गिरती कानून व्यवस्था के सवाल को उठा कर हेमंत सरकार की घेराबंदी की होगी. सुभाष  मुंडा का पार्थिव शरीर का दाह संस्कार के वक्त बाबूलाल मरांडी सहित दूसरे नेताओं की मौजूदगी से इसके संकेत मिल चुके हैं.

सुभाष मुंडा की हत्या से आदिवासी मूलवासी संगठनों में आक्रोश

सुभाष मुंडा की हत्या को लेकर आदिवासी मूलवासी संगठनों में आक्रोश को वह विधान सभा के अन्दर काटने की रणनीति पर काम करेगा. अब विधान सभा के अन्दर से इस को प्रचारित करने की कोशिश की जायेगी कि हेमंत सोरेन के राज्य में सबसे ज्यादा असुरक्षित यदि कोई तबका है, तो वह यहां के आदिवासी मूलवासी हैं, जिस प्रकार मौके वारदात पर घटना के तुरंत बाद गीताश्री की उपस्थिति हुई, बाबूलाल से लेकर रघुवर दास एक्टिव हुए, उससे भाजपा की राजनीति और रणनीति को समझना मुश्किल नहीं है.

 

चेहरा बदलने की कोशिश में भाजपा

दरअसल हालिया दिनों भाजपा झारखंड में अपने चेहरे को बदलने की कोशिश करती नजर आ रही है, उसकी कोशिश सामान्य वर्ग के मतदाताओं से बाहर निकल आदिवासी मूलवासियों में अपनी पकड़ बढ़ाने की है, इसी रणनीति के तहत बाबूलाल के चेहरे को सामने लाया गया है, अब तक भाजपा की राजनीतिक मजबूरी थी कि उसके पास आदिवासी मूलवासियों को कोई बड़ा चेहरा नहीं था, वह सिर्फ मोदी के चेहरे के बल झारखंड भाजपा को साधने की कोशिश में था, जिन  चेहरों को सामने रख झारखंड की राजनीति साधी जा रही थी, उनका कोई बड़ा जनाधार नहीं था, कई बड़े चेहरे तो अपने बूते एक विधान सभा की सीट विजय दिलवाने की स्थिति में नहीं थे, लेकिन 2019 का विधान सभा में मिली पराजय के बाद भाजपा को यह विश्वास हो गया था कि सिर्फ राष्ट्रवाद और हिन्दू मुस्लिम का खेल कर वह झारखंड में अपनी विजय पताका नहीं फहरा सकती है, लम्बी सफलता के लिए उसे यहां के सामाजिक समीकरणों को साधना पड़ेगा, बाबूलाल भाजपा की इसी राजनीतिक बेबसी का नतीजा है, इसके साथ ही भाजपा की कोशिश अब विधायक दल के नेता के तौर पर भी किसी पिछड़ी जाति के चेहरे को सामने लाने की है, बहुत संभव है कि वह जल्द ही जयप्रकाश पटेल या विरंची नारायण के नाम की घोषणा कर दे,

बांग्लादेशी घूसपैठ का जवाब, ओबीसी आरक्षण

जबकि दूसरी ओर सत्ता पक्ष की कोशिश खतियान आधारित स्थानीय नीति, ओबीसी आरक्षण और मॉब लिंचिंग विधेयक को एक बार विधान सभा से पारित कर राजभवन भेजने की तैयारी में है, ताकि इस बात को प्रचारित  प्रसारित किया जा सके कि भाजपा के इशारे पर ही आदिवासी मूलवासियों से जुड़े विधेयकों को लौटाया जा रहा है, यह भाजपा ही हैं, जो किसी भी कीमत पर खतियान आधारित स्थानीय नीति को पारित होने देना नहीं चाहती है, यदि भाजपा सदन के पटल पर इसका विरोध करती है, तो निश्चित रुप से चेहरा बदलने की उसकी पूरी कवायद बेकार हो जायेगी और उस पर आदिवासी मूलवासी विरोधी होने का आरोप और भी पुख्ता तौर पर चस्पा हो जायेगा.  

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