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Bihar Politics - आखिरकार ‘कमल’ के हुए आरसीपी, नालंदा जिले में 40 बीघा जमीन खरीदने का लगा था आरोप

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 12:44:49 PM

पटना(PATNA)- आखिरकार तमाम धात प्रतिधात, कयासों और आशंकाओं को सच साबित करते हुए जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सीएम नीतीश के बेहद खासमखास माने जाने वाले आरसीपी सिंह ने ‘कमल” का दामन थाम ही लिया. इसके साथ ही लम्बे अर्से से जदयू के अन्दर चलती रही उस ‘कांस्पीरेसी थ्योरी’ को सही साबित कर दिया गया कि जदूय के अन्दर भाजपा का स्लीपर सेल एक्टिव है. और इस स्लीपर सेल को वर्ष 2024 के पहले जदयू का सबसे चमकदार चेहरा सीएम नीतीश को राजनीतिक रुप से इनएक्टिव करने की जिम्मेवारी सौंपी गयी है.

आरसीपी सिंह के कद के अनुरुप नहीं हुआ स्वागत

हालांकि आरसीपी सिंह के द्वारा जिस प्रकार के दावे किये जा रहे थें और जितनी बड़ी अपनी राजनीतिक हैसियत बतायी जा रही है, उस कद के अनुरुप उनका स्वागत नहीं किया गया. दिल्ली के भाजपा कार्यालय में एक बेहद सादे समारोह में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उन्हे भाजपा की सदस्यता दिलवायी. माना जा रहा था कि भाजपा में उनका स्वागत गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा किया जा सकता है, लेकिन यह मात्र खबर बन कर रह गयी. इस अवसर पर आरसीपी सिंह ने कहा कि बिहार का हाल वर्ष 2005 से बूरा है. कभी सुशासन की छवि रखने वाले सीएम नीतीश को आज अपराधी और अपराध पसंद है.

पिछले 24 वर्षों से नीतीश कुमार की राजनीतिक साया बन कर रहे थें काम

ध्यान रहे कि वह 24 वर्षों से सीएम नीतीश के प्रमुख सहयोगी के रुप में काम कर रहे थें. लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनपर पार्टी विरोधी गतिविधियों का संचालन करने का आरोप लग रहा था, साथ ही वह सीएम नीतीश का  भरोसा भी खो चुके थें. यही कारण है दो दो बार उन्हे राज्य सभा भेजने वाला जदयू ने  इस बार उन्हे राज्य सभा भेजने से इंकार कर दिया था.जिसके बाद उन्हे केन्द्रीय मंत्री पद से रुखसत होना पड़ा था.

1984 बैच के आईएएस अधिकारी हैं आरसीपी सिंह

याद रहे कि आरसीपी सिंह 1984 बैच के आईएएस अधिकारी रह चुके हैं, और सीएम नीतीश के गृह जिले नालंदा के रहने वाले हैं. नीतीश कुमार जब केन्द्र में मंत्री बने थें तब उन्हे यूपी से लाकर अपना सचिव बनाया था, और यहीं से सीएम नीतीश के साथ उनकी नजदीकियां शुरु हुई थी, बाद में वह राजनीति के मैदान में उतर गये और जदयू कोटे से उन्हे केन्द्र में मंत्री और दो-दो बार राज्यसभा का सदस्य बनाया गया.

केन्द्रीय मंत्रीपद से विदाई के बाद सीएम नीतीश के खिलाफ काफी तल्ख हो गयी थी उनकी भाषा

केन्द्रीय मंत्रालय से रुख्सत के बाद उनकी भाषा सीएम नीतीश के खिलाफ काफी तल्ख हो चुकी थी. और वह सीएम नीतीश  पर  बेहद निजी हमले करने से भी चूक नहीं रहे थें, इस बीच जदयू के द्वारा उन पर भ्रष्टाचार का एक संगीन आरोप भी लगाया था, दावा किया गया था कि केन्द्रीय मंत्री रहते हुए इनके द्वारा नालंदा जिले के अस्थवां और इस्लामपुर प्रखंड में इनके द्वारा करीबन चालिस बीधा जमीन की खरीद की गयी थी. इसके साथ ही बिहार के कई जिलों में इनकी कई बेनामी संपत्तियों का भी दावा किया गया था, इन सभी आरोपों का कोई जवाब आरसीपी सिंह के द्वारा नहीं दिया गया. हालांकि इन आरोपों को सामने आने के बाद उनके द्वारा जदयू से इस्तीफा दे दिया गया था, और भाजपा में शामिल होने की चर्चा शुरु हो गयी थी. उनका दावा था कि उनके साथ जदयू के करीबन एक दर्जन सांसद पार्टी को अलविदा कर सकते हैं. जदयू विरोधियों को आरसीपी सिंह के इस दावे में दम भी नजर आता था, उनका तर्क था कि आरसीपी सिंह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं, पार्टी के शीर्ष संगठन से लेकर जमनी स्तर तक उनके लोगों मौजूद है. आरसीपी सिंह के एक इशारे के साथ ही जदयू का पूरा कुनबा बिखर सकता है.

नीतीश कुमार की कृपा दृष्टि से बने थें राष्ट्रीय अध्यक्ष 

लेकिन अब जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार उनके साथ कुछ एक कार्यकर्ताओं को छोड़कर कोई बड़ा चेहरा साथ नहीं जा रहा है. इस प्रकार जदयू का वह दावा सत्य होता प्रतीत हो रहा है कि आरसीपी सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि नीतीश कुमार की कृपा दृष्टि के कारण बने थें और पार्टी का एकमात्र चेहरा नीतीश कुमार है. पूरी पार्टी उनके साथ खड़ी है, हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि 2024 का लोकसभा चुनाव अब सामने खड़ा है, इस हालात में कई वर्तमान सांसदों को अपनी टिकट की चिंता भी सत्ता रही है, राजद, जदयू, कांग्रेस और हम के महागबंधन के सीटों का बंटवारा किस प्रकार होगा, यह चिंता उनके सामने मुंह बायें खड़ी होगी, इस हालत में कुछ वर्तमान सांसदों का इधर उधर होने या पाला बदलने की किसी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता.

राजनीति के धुरंधर सीएम नीतीश ने वक्त रहते कर ली थी पहचान

लेकिन इसके साथ ही चर्चा इस बात की भी चल रही है कि राजनीति के धुरंधर सीएम नीतीश ने वक्त रहते ही आरसीपी सिंह के नब्ज की पहचान कर ली थी, उनके नब्ज की तेज धड़कन उन्हे सुनाई दे गयी थी. जिस प्रकार चिराग को आगे कर नीतीश कुमार को कमजोर करने की  रणनीति तैयार की गयी थी, इसका  एहसास नीतीश कुमार को वक्त रहते हो गया था और उसका एक सिरा आरसीपी सिंह के जुड़ा नजर आने लगा था.

नीतीश की इच्छा के विपरीत बने थें केन्द्रीय मंत्री

ध्यान रहे कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के सवाल पर जदयू के अन्दर कई मतभेद थें, केन्द्रीय मंत्रिमंडल पर कई चेहरों की दावेदारी थी, खुद नीतीश एक मंत्री पद लेने के पक्ष में नहीं थें. उनकी चाहत कम से कम दो मंत्री की थी, जिससे कि ललन सिंह को समायोजित किया जा सके, इस विवाद को समाधान करने की जिम्मेवारी सीएम नीतीश ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में आरसीपी सिंह के कंधों पर सौंपी थी, लेकिन इस विवाद का समाधान करने के बजाय इस विवाद का  समाधान करने दिल्ली पहुंचते ही अपने लिए एक मंत्री पद लेकर इस मामले को और भी उलझा दिया.

केन्द्रीय मंत्री बनते ही नीतीश से दूर हो गये थें आरसीपी सिंह

कहा जा सकता है कि जदयू के आरसीपी सिंह के छुट्टी उनके केन्द्रीय मंत्री बनते ही हो गयी थी, हालांकि उस वक्त सीएम नीतीश ने कुछ नहीं बोला, लेकिन उनके दिल से वह दूर जा चुके थें और आरसीपी सिंह के रुप में एक कुर्मी को प्रोमोट करने का आरोप उन पर चस्पा हो चुका था. लेकिन नीतीश की राजनीति समझना इतना आसान कहां है, आखिरकार इनकी राज्यसभा की सदस्यता का समय पूरा हो गया, और राजनीति के चतुर खिलाड़ी सीएम नीतीश ने उनकी राज्यसभा की सदस्यता पर अपनी मुहर नहीं लगाया और इस प्रकार उनका मंत्री पद चला गया.

एक बेचारगी के साथ भाजपा में जाना आरसीपी सिंह की राजनीतिक विवशता

और आज जिस बेचारगी के भाव लिए आरसीपी सिंह भाजपा में जा रहे हैं, यह उनकी पंसद से ज्यादा उनकी राजनीतिक मजबूरी है, क्योंकि साफ है कि भाजपा उनका इस्तेमाल नीतीश के खिलाफ नांलदा के किले में करेगी, क्योंकि संकेत यह है कि नीतीश कुमार इस बार नालंदा संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकते हैं और उनके सामने भाजपा को एक कुर्मी चेहरे की खोज थी, भाजपा को आरसीपी सिंह में वह चेहरा दिख रहा है, हालांकि नालंदा को फतह करना आरसीपी सिंह के लिए कितना मुश्किल है, इसे खुद आरसीपी सिंह से बेहतर कोई नहीं जानता, एक बार ज्योंही उन्हे हार मिलती है, उनकी राजनीतिक साख किस कदर बिखरेगी उसका आकलन अभी करना उचित प्रतीत नहीं होता. प्रतीत नहीं होता.

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