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पत्रकार की भूमिका में राहुल गांधी ने दागा सवाल! राष्ट्रीय मीडिया में कहां खड़ा है दलित, आदिवासी और ओबीसी चेहरे

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 6:22:00 PM

TNP DESK- राहुल गांधी इन दिनों नित्य नुतन प्रयोग करते नजर आ रहे हैं, कभी वह कुली बन समान ढोते नजर आते हैं, तो कभी फर्नीचर मिस्त्री से उसके पेशे की चुनौतियों को समझने की कोशिश करते दिखते हैं, तो कभी उन्हे सब्जी मंडी में खुदरा विक्रेताओं का सुख-दुख समझते हुए देखा जाता है. लेकिन अब उनका एक नया अवतार हुआ है, इस बार वह एक पत्रकार के रुप में जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का साक्षात्कार लेते हुए दिखलाई पड़ रहे हैं.

हालांकि इस साक्षात्कार के बाद मुख्य चर्चा फुलवामा हमले को लेकर हो रही है, जिसमें सत्यापाल मलिक इस बात का दावा कर रहे हैं कि यदि उस समय भारत सरकार सेना के जवानों को महज तीन हेलीकॉप्टर उपलब्ध करवा देती, तो देश को 40 जवानों की शहादत का दर्द नहीं झेलना पड़ता, सत्यपाल मलिक कह रहे हैं कि उन जवानों की शहादत से भी ज्यादा दुखद बात की है कि जवानों की इस शहादत को एक इवेंट के तौर पर दिख लाया गया. लेकिन जिनकी वजह से इन जवानों को शहादत देनी पड़ी, उन तमाम चेहरों को सुरक्षित बचा लिया गया, एक भी अधिकारी पर कोई गाज नहीं गिरा. आज यह कोई नहीं जानता कि 300 किलो यह आरडीएक्स हमारी सरहद तक पहुंचाने में पाकिस्तान कामयाब कैसे रहा. और तब हमारे तमाम सुरक्षा एजेंसिया क्या कर रही थी, उनको इस बात की भनक क्यों नहीं लगी. क्या सवाल गृह मंत्रालय और पीएम मोदी से नहीं पूछा जाना चाहिए?

तीन माह तक गृह मंत्रालय में पड़ी रही हेलीकॉप्टर की फाइल

सत्यपाल मलिक कहते हैं कि तीन महीनों तक तीन हेलीकॉप्टर के लिए सेना की फाइल गृह मंत्रालय के पास पड़ी रही, लेकिन हेलिकॉप्टर नहीं मिला. आखिरकार निराश जवानों ने सड़क मार्ग से निकलने का फैसला किया. और बड़ी बात यह रही है कि उस रास्ते को भी सैनिटाईज भी नहीं किया गया, जबकि राज्य सरकार की पुलिस भी आती जाती है, तो उन तमाम रास्तों को सैनिटाईज किया जाता है. इस प्रकार सवाल खड़ा होता है कि सेना की इस शहादत का जिम्मेवार कौन था? जिस पार्टी ने इसे बतौर इंवेट बना कर पेश किया, क्या कभी उस पार्टी ने इसके असली गुनाहगारों तक पहुंचने का प्रयास किया? क्या उन अधिकारियों पर गाज गिरी, जिसने तीन महीनों तक हेलीकॉप्टर वाली फाइन को दबाये रखा? आखिर इसका कुसूरवार कौन है? क्या भारत सरकार और प्रधानमंत्री इस जिम्मेवारी से भाग सकते हैं? वकौल सत्यपाल मल्लिक दुखद तो यह है कि जब हमने पीएम मोदी से कहा कि इन जवानों की शहादत हमारी गलतियों के कारण हुई है, तो हमे अपनी जुबान पर ताला लगाने का हुक्म सुना दिया गया.

पीएम मोदी पर सवाल खड़ा करते ही पाकिस्तान की खबरें दिखलाने लगता है मीडिया

सत्यपाल मलिक ने दावा किया कि मेन स्ट्रीम मीडिया और अखबारों में देश के वास्तविक मुद्दों को स्थान नहीं दिया जा रहा है, पूरी मोदी सरकार मीडिया मैनेजमेंट के सहारे चल रही है. जैसी ही विपक्ष की ओर से कोई महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया जाता है, हमारे चैनल पाकिस्तान की रिपोर्टिंग दिखलाने लगते हैं, वहां की भूखमरी की झूठी तस्वीर पेश करने लगते हैं, अपना ही उदाहरण देते हुए उन्होने दावा किया जब पहली बार हमने इस सवाल को खड़ा किया था तो अतीक अहमद की हत्या को बतौर इवेंट पेश किया जाने लगा, और लगातार 15 दिनों तक उसे सुर्खियां बना कर हमारी आवाज को दबा दिया गया, बावजूद इसके हम इस बात को दावे के साथ कहते हैं कि 2024 में मोदी की सरकार नहीं आने वाली है.

राहुल का सवाल, मीडिया से गायब क्यों है दलित आदिवासी और पिछड़े चेहरे  

जैसी ही सत्यपाल मलिक ने मीडिया का चरित्र और उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा किया, राहुल गांधी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि इसका कारण क्या है. क्यों आज की मीडिया सत्ता की दलाली करती नजर आ रही है, और इस सवाल का खुद ही जवाब देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि इसकी वजह यह है कि कथित मेनस्ट्रीम मीडिया से दलित ओबीसी और आदिवासी चेहरों का गायब होना, किसी भी मीडिया घराने मे आज कोई भी दलित आदिवासी और ओबीसी  पत्रकार दिखलायी नहीं पड़ता. मीडिया के इस एकपक्षीय चरित्र का कारण मीडिया की यही संरचना है. जहां कुछ मुट्ठी पर लोग पूरे तंत्र पर काबिज हैं, जब तक इस मीडिया में दलित ओबीसी और आदिवासी पत्रकारों को स्थान नहीं दिया जाता, इसकी विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे मे रहेगी.    

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