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भारत रत्न के बाद अब क्रेडिट पॉलिटिक्स की शुरुआत! सीएम नीतीश का दावा कर्पूरी की लड़ाई हमने लड़ी, अपने माथे क्रेडिट नहीं लें पीएम

भारत रत्न के बाद अब क्रेडिट पॉलिटिक्स की शुरुआत! सीएम नीतीश का दावा कर्पूरी की लड़ाई हमने लड़ी, अपने माथे क्रेडिट नहीं लें पीएम

Patna-कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न के साथ ही इसका क्रेडिट किसके सिर बंधे, अब इसकी सियासत भी तेज होती नजर आ रही है, राजधानी के पटना के वेटनरी ग्राउंड पर कर्पूरी ठाकुर के जन्मशताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए सीएम नीतीश ने इशारो ही इशारों में कर्पूरी ठाकुर को मिले भारत रत्न का क्रेडिट अपने नाम करने का संकेत दिया है, उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी सूचना कर्पूरी ठाकुर के सुपुत्र रामनाथ ठाकुर को तो दिया, लेकिन हमें इसकी कोई औपचारिक सूचना नहीं, जबकि हम लम्बे अर्से से इसकी लड़ाई लड़ते रहे हैं. अच्छा होता कि इसकी एक औपचारिक सूचना हमें भी दी जाती, लेकिन फिर भी इस कदम के लिए पीएम को धन्यवाद, लेकिन वह इसका सारा क्रेडिट खुद लेने की कोशिश नहीं करें.

जातीय जनगणना के बगैर नहीं हो सकता पिछड़ों और दलितों का कल्याण

इसके साथ ही अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए सीएम नीतीश ने कहा कि हमारी कोशिश तो पूरे देश में जातीय जनगणना करवाने की थी, लेकिन पीएम मोदी ने इसे स्वीकार नहीं किया, प्रधानमंत्री मोदी को अभी भी हमारी इस दूसरी मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए, ताकि पूरे देश में दलित, पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों को उनका हक प्राप्त हो जाय, सत्ता से लेकर सरकार में उनकी हिस्सेदारी-भागीदारी का रास्ता साफ हो जाय.  इसके साथ ही सीएम नीतीश ने हिन्दु मुस्लिम एकता की बात करते हुए हर जाति वर्ग के लोगों को एकजूट रहने का संदेश भी दिया, उन्होंने कहा कि हमने हर गरीब परिवार को दो दो लाख देने का फैसला किया है, ताकि वह भी दूसरे लोगों की तरह अपना व्यवसाय खड़ा कर जीवन यापन कर सकें.

परिवारवाद की सियासत करने वाली पार्टियों को कर्पूरी से सबक लेने की जरुरत

कर्पूरी ठाकुर को याद करते हुए सीएम नीतीश ने कहा कि उन्होंने कभी भी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया, यहां तक की उनके बेटे को भी सांसद जदयू ने बनाया, कर्पूरी ठाकुर यह कदम परिवारवाद की सियासत करने वालों सारी सियासी दलों के लिए एक सबक है. लगे हाथ उन्होंने इस देर के लिए कांग्रेस को भी आड़ों हाथों लिया, उन्होंने कहा कि लम्बे समय से हमने यही मांग कांग्रेस के समक्ष भी रखा था, लेकिन कांग्रेस भी यह मांग पूरी नहीं कर सकी. खैर अब हमारी मांग पूरी हो गयी है, हमने इसके लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है, तब जाकर यह मुकाम आया है और आज एक अतिपिछड़ें के बेटे को यह सम्मान मिला है. ध्यान रहे कि नीतीश कुमार काफी लम्बे अर्से से कर्पूरी ठाकुर और पर्वत पुरुष दशरथ मांझी के लिए भारत रत्न की मांग करते रहे हैं. वह हमेशा अपने आप को कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी रास्ते पर चलने वाला सिपाही बताते रहें है.  

इधर तेजस्वी ने मान्यवर कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग कर मचाया हलचल

इस बीच उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कांशीराम के लिए भी भारत रत्न की मांग कर बिहार की सियासत में एक और सरगर्मी ला दी है. विधान मंडल परिसर में कर्पूरी ठाकुर की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए तेजस्वी ने कहा है कि जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की राजद की बहुत ही पुरानी मांग थी, जब प्रधानमंत्री बिहार आये थें तब भी मैंने भरी मंच से उनसे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग किया था, देर से सही आखिरकार भाजपा को कर्पूरी ठाकुर की याद तो आयी, इसके लिए शुक्रिया, लेकिन काश:  इसके साथ ही कांशीराम को भी यह सम्मान दे दिया गया होता तो आज की यह खुशी दुगनी होती.

भाजपा को दलितों और महादलितों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है

साफ है कि तेजस्वी यादव ने अपने बयान से दलित समुदाय की उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिनके अंदर आज कांशीराम के लिए भारत रत्न का ख्वाब जग रहा होगा, ध्यान रहे कि राजद काफी अर्से से कर्पूरी ठाकुर के साथ ही कांशीराम को भी भारत रत्न देने की मांग करता रहा है. दूसरी तरफ जदयू की ओर से कर्पूरी ठाकुर के साथ ही पर्वत पुरुष दशरथ मांझी को भी भारत रत्न देने की मांग की जाती रही है. खुद पूर्व सीएम जीतन राम मांझी भी इस मांग को दुहराते रहे हैं. इस हालत में जहां भाजपा कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न प्रदान कर अति पिछड़ी जातियों की हितैषी होने का दावा कर रही है, वहीं कांशीराम और दशरथ मांझी को दरकिनार किये जाने के  कारण उसे दलित और महादलितों की नाराजगी का सामना भी करना पड़ सकता है.

तेज हो सकती है कांशीराम के लिए भारत रत्न की मांग

ध्यान रहे कि जातीय जनगणना के आंकड़े के अनुसार बिहार में दलित और महादलितों की आबादी करीबन 20 फीसदी की है, और 20 फीसदी की इस आबादी में अति पिछड़ी जातियों के समान ही सीएम नीतीश का एक बड़ा और मजबूत जनाधार है. अब इसकी काट खोजना भाजपा को मुश्किल हो सकता है. दूसरी तरफ देश की सियासत के साथ ही यूपी की राजनीति में कांशीराम का एक अपना जलबा है. उन्हे आजादी के बाद दलितों का सबसे बड़ा आईकॉन माना जाता है, पूरे देश में दलित जातियों के बीच कांशीराम का नाम बेहद ही सम्मान के साथ लिया जाता है, बिहार हो महाराष्ट्र या फिर दूसरे हिन्दी भाषा भाषी राज्य कांशीराम को चाहने वालों की एक लम्बी जमात है. बहन मायावती तो खुद को कांशीराम का उतराधिकारी भी मानती है, और यही कारण है कि मायावती और बसपा के द्वारा लम्बे समय से दलित जातियों के इस आईकॉन के लिए भारत रत्न की मांग करती रही है, इस हालत में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न की घोषणा के साथ ही कांशी राम के लिए भी भारत रत्न की मांग तेज हो सकती है. और दलित जातियों के अंदर छुपी इसी चाहत को तेजस्वी हवा देते नजर आते हैं, और यदि तेजस्वी की यह तीर निशाने पर लगता है तो भाजपा के सामने संकट सिर्फ बिहार ही नहीं दूसरे राज्यों में भी  खड़ा हो सकता है.

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Published at:24 Jan 2024 04:31 PM (IST)
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