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Jharkhand Politics: चंपई सोरेन को क्यों नहीं मिल रहा विधायकों का साथ,पढ़िए इस रिपोर्ट में

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 5:51:30 PM

Jharkhand Politics : झारखंड की राजनीति पानी के बुलबुले की तरह हो गई है. चंपई सोरेन का मामला ताजा उदाहरण है. चंपई सोरेन ने अपने भावुक पोस्ट में खुद के लिए तीन विकल्प गिनाए है. पहला या तो राजनीति से संन्यास ले लूं या फिर नया संगठन खड़ा करूं या किसी के साथ हो लूं. किसी के साथ ही होने का उन्हें सही निर्णय लगा और वह भाजपा की ओर मुड़ गए.

इधर बहरागोड़ा के विधायक समीर मोहंती, चक्रधरपुर के विधायक सुखराम उरांव, खरसावां के विधायक दशरथ गगराई ,खिजरी के विधायक राजेश कच्छप ,बिशनपुर के विधायक चमरा लिंडा, पोटका के विधायक संजीव सरदार ने इस बात का खंडन किया है कि वह भाजपा में शामिल होंगे. लोबिन हेंब्रम की बात छोड़ दी जाए और विधायकों की बात पर भरोसा किया जाए तो चंपई सोरेन अकेला पड़ गए है. तैयारी तो यह थी कि रविवार को ही भाजपा में शामिल हो जाएंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. शनिवार की शाम तक चंपई सोरेन रांची में थे लेकिन उसके बाद दिल्ली पहुंच गए.

चंपई सोरेन के लिए झामुमो छोड़ना उनकी मजबूरी

इधर चंपई सोरेन के इस कदम से झारखंड की राजनीति गरमा गई है. वैसे सत्ता पक्ष की तरफ से झामुमो के 26 फिलहाल विधायक हैं. कांग्रेस के 17 विधायक हैं. राजद के एक और भाकपा माले  के एक विधायक हैं. जबकि विपक्ष के पास भाजपा के 23, आजसू के तीन, एनसीपी के एक और निर्दलीय दो विधायक हैं .जो 7 सीटें खाली है, उनमें भाजपा की तीन और झामुम की चार सीटें शामिल है. चंपई सोरेन के  पोस्ट को आधार माना जाए तो चंपई सोरेन के लिए झामुमो छोड़ना उनकी मजबूरी है .तो भाजपा के लिए भी चंपई सोरेन जैसे नेता को शामिल करना पार्टी की मजबूरी कहीं जा सकती है. 2019 के विधानसभा चुनाव में कोल्हान की सभी 14 सीटें बीजेपी हार गई थी. भाजपा को कोल्हान के लिए एक आदिवासी सर्वमान्य नेता की जरूरत थी. भाजपा की नजर में चंपई सोरेन उस जरुरत को पूरा कर सकते हैं. वैसे चंपई सोरेन ने कहा है कि यह मेरा निजी संघर्ष है. इसमें पार्टी के किसी सदस्य को शामिल करने या संगठन को किसी प्रकार की क्षति पहुंचाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. जिस पार्टी को हमने अपने खून पसीने से सींचा है, उसका नुकसान करने के बारे में तो कभी सोच भी नहीं सकते. लेकिन हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि उन्हें चुनना पड़ रहा है.

रविवार के दिन ही झारखंड की राजनीति में उथल-पुथल का दिन क्यों चुना गया

एक चर्चा  है कि रविवार के दिन ही झारखंड की राजनीति में उथल-पुथल का दिन क्यों चुना गया, तो इसके  इसके पीछे धनबाद के झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं का तर्क है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रविवार को ही मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना की शुरुआत संथाल परगना से की है. इस योजना के प्रचार प्रसार को  कम करने के लिए रविवार का दिन चुना गया था. कहा तो यह भी जा रहा है कि चंपई सोरेन के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा के और विधायकों के जाने की बात थी. लेकिन विधायक दिल्ली नहीं पहुंचे. इस वजह से भाजपा में शामिल होने की बात को टाल दिया गया है. वैसे चंपई सोरेन प्रकरण पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा है कि झाड़ू पोछा मारकर इनको गुजरात भेज देना है .यह लोग गुजरात ,असम और महाराष्ट्र से आकर आदिवासी, पिछड़े और दलितों के बीच जहर घोलने का काम कर रहे हैं. एक दूसरे से लड़वाने का काम कर रहे हैं. घर तोड़ने का काम कर रहे हैं. जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि अगर चंपई सोरेन भाजपा में शामिल हो गए, जो लगभग तय है, तो कोल्हान में झारखंड मुक्ति मोर्चा को भी कड़ा संघर्ष करना पड़ सकता है. अभी तक कोल्हान में झारखंड मुक्ति मोर्चा के चुनाव की राजनीति की बागडोर चंपई सोरेन के हाथ में होती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. संथाल परगना और कोल्हान झारखंड मुक्ति मोर्चा की ताकत है.

2024 के विधानसभा चुनाव को भाजपा गंभीरता से ले रही 

लोकसभा चुनाव में भी संथाल   को डिस्टर्ब करने की कोशिश की गई. यह अलग बात है कि बहुत कामयाबी नहीं मिली. लेकिन विधानसभा चुनाव के पहले कोल्हान को भी डिस्टर्ब करने की कोशिश हुई है. यह अलग बात है कि चंपई सोरेन की पार्टी छोड़ने की बात को भाजपा अपने ढंग से भुनाने की कोशिश करेगी तो झारखंड मुक्ति मोर्चा भी अपने ढंग से इसे इन कैश करने का प्रयास करेगा. वैसे भी झारखंड की राजनीति विचित्र है. 5 साल तक रघुवर सरकार चली तो उसमें भी तोड़फोड़ की राजनीति के बाद ही ऐसा हुआ.  2024 के विधानसभा चुनाव को भाजपा गंभीरता से ले रही है और इसके लिए तमाम तरकीब अपनाई जा रही है.

रिपोर्ट: धनबाद ब्यूरो

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