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जनसंग्राम से जयश्रीराम, कॉरपोरेट पॉलिटिक्स का नया सितारा जयराम!  झारखंड का अन्ना या जनसंघर्ष का चेहरा

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 4:32:04 AM

रांची(RANCHI)- झारखंडी भाषा, 1932 का खतियान, सरना धर्म कोड, जातीय जनगणना, पिछड़ों का आरक्षण विस्तार, खतियान आधारित नियोजन नीति की मांग को लेकर हेमंत सरकार के खिलाफ व्यापक जन गोलबंदी तैयार करने वाले जयराम ने आखिरकार अपनी सियासी पारी का आगाज कर दिया, हालांकि इसकी चर्चा पहले से ही की जा रही थी कि लेकिन जयराम बार-बार संसाधनों का रोना रोते नजर आ रहे थें, उनका कहना था कि हमारी कोशिश वर्तमान राजनीतिक सत्ता पर दवाब बनाकर ही इन मुददों का समाधान की है, चुनाव लड़ना इतना आसान नहीं है, उसके लिए बेहिसाब संसाधनों की जरुरत होती है, उस वक्त भी जयराम इस बात का साफ संकेत दे रहे थें कि बगैर किसी कॉरपोरेट फंडिंग के चुनावी दंगल में उतरना मुश्किल ही नामुमकिन भी है.

दो चार सीटों से नहीं बदल सकता सत्ता का चरित्र

यही वर्तमान राजनीति की सच्चाई है, बगैर संसाधन के दो चार सीटों पर तो मुकाबला किया जा सकता है, जीत भी हासिल की जा सकती है, लेकिन इससे सत्ता का चरित्र नहीं बदला जा सकता, उसके लिए आपको विधान सभा में अपनी ताकत का इजहार करना होगा, तब ही आप अपने मुद्दों की राजनीति और अपने वादों को उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं.

70 हजार समर्थकों के बीच सियासी पारी का एलान

लेकिन अचानक से जब 18 जून की दोपहर पूरा झारखंड 44 डिग्री में उबल रहा था, धनबाद के बलियापुर हवाई अड्डा में करीबन 70 हजार समर्थकों के बीच जयराम ने झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति के बैनर तले सियासी मैदान में उतरने का एलान कर झारखंड की पॉलिटिक्स का पारा हाई कर दिया.

कहां से आ टपका संसाधनों का खजाना

लेकिन सवाल यहां यह खड़ा होता है कि कल तक जिस संसाधनों का रोना जयराम महतो रो रहे थें, अचानक से उसकी कमी कहां से, और कैसे पूरी हो गयी?  हालांकि संसाधनों का सवाल तब भी खड़ा हो रहा था, जब भाषा आन्दोलन के दौरान जयराम महतो अपने निजी कमांडों के साथ घूमते नजर आ रहे थें, 20 से 25 काले कमांडो की फौज उनके साथ खड़ी नजर आती थी. पूरे भाषा आन्दोलन के दौरान जयराम को संसाधनों की कोई कमी होती दिखाई नहीं दी. हालांकि वह अपनी सादगी को दिखाने की कोशिश कर रहे थें, कमांडो की बात को छूपाने की हर संभव कोशिश की जा रही थी, और बहुत ही चालाकी से अपने चेहरे को झारखंडी अन्ना के रुप में प्रचारित करने की रणनीति बनायी जा रही थी.

कॉरपोरेट फंडिंग के इस चाल को भांप गये थे जगरनाथ महतो

ध्यान रहे कि जयराम महतो के पीछे खड़े कॉरपोरेट की ताकत का अन्दाजा झारखंड की राजनीति में टाईगर माने जाने वाले जगरनाथ महतो को बहुत पहले ही हो गया था. भाषा आन्दोलन के नाम पर खेली जा रही राजनीति और कॉरपोरेट फंडिंग की इस चाल को वह बहुत ही बारीकी से समझ रहे थें. यही कारण है कि जब भाषा आन्दोलन अपने शबाब पर था, तब  भी जगरनाथ महतो जयराम को अपने निशाने पर लेने से पीछे नहीं हट रहे थें. दरअसल जगरनाथ महतो को कॉरपोरेट फंडिंग का भान इसलिए भी सबसे पहले हो गया, क्योंकि जयराम महतो की राजनीतिक पाठशाला की टाईगर जगरनाथ महतो की छत्रछाया में ही शुरु हुई थी. राजनीति का पहला पाठ जयराम महतो ने उन्ही की निगरानी में सीखा था.

झारखंड का अन्ना या जनसंघर्ष का चेहरा

ध्यान रहे कि आज विभिन्न मीडिया घरानों के द्वारा जयराम महतो को आमंत्रित किया जा रहा है, उनके पोस्टर टांगे जा रहे हैं. ब्रांडिंग की रुप रेखा तैयारा की जा रही है, याद कीजिये, राष्ट्रीय राजनीति में यही सब कुछ अन्ना आंदोलन के दौरान हुआ था, तब राजनीति के बड़े बड़े माहिर खिलाड़ियों को भी इसका भान नहीं था कि वह जिस अन्ना के पीछे दौड़े जा रहे हैं, वह कुछ नहीं सिर्फ संघी प्रयोग का एक कठपुतली भर है.  

पर्दे के पीछे खड़ी है भाजपा 

विश्लेषकों का दावा है कि जयराम महतो जितने जोर शोर से सरना धर्म कोड, जातीय जनगणना, पिछड़ों का आरक्षण विस्तार, 1932 का खतियान, खतियान आधारित नियोजन नीति को लेकर हेमंत सरकार के खिलाफ आक्रामक होगा, उसका नुकसान सिर्फ और सिर्फ झामुमो को ही होगा. और भाजपा की यही रणनीति है.  उनका दावा है कि जयराम महतो महज एक मोहरा हैं, पर्दे के पीछे भाजपा खड़ी है.

बाबूलाल का प्रयोग असफल, अब जयराम का भविष्य दांव पर लगा चुकी है भाजपा

ध्यान रहे कि इसी प्रकार  2019 का विधान सभा चुनाव में भाजपा के हेलिकॉप्टर पर सवार होकर कर बाबूलाल मरांडी भाजपा के खिलाफ ही चुनावी मैदान में अपना दम खम दिखलाने का प्रपंच कर रहे थें, ताकि आदिवासी-मूलवासियों के मुद्दों को उछाल कर इन मतों को विभाजित किया जा सके. हालांकि बाबूलाल इस प्रयोग में सफल नहीं हो सके और तमाम दुष्चक्रों के बावजूद भाजपा को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी. अब उसी प्रयोग को भाजपा एक बार फिर से दुहराने जा रही है. लेकिन इस बार उसका चेहरा बदला हुआ है,  2019 में जो जिम्मेवारी बाबूलाल के कंधे पर थी, इस बार उस भूमिका का निर्वाह जयराम महतो के जिम्मे होगी. देखना होगा कि जयराम महतो भाजपा की उस अग्नि परीक्षा में सफल होते हैं या नहीं. या फिर से बाबूलाल मरांडी की तरह ही यह प्रयोग भी असफल हो जाता है, हालांकि बाबूलाल मरांडी और जयराम महतो में एक बड़ा अन्तर है, वाचालता और लोकप्रियता के पैमाने पर जयराम महतो का कहीं कोई मुकाबला नहीं है. आप पसंद करें या नफरत, लेकिन सच्चाई है कि झारखंड में जयराम महतो के पास काफी लम्बी फैन फोलिंगिंग है.

Tags:corporate politicJayramjairam mahtojagarnath mahtoकॉरपोरेट फंडिंगझारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति

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