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खानाबदोश 'गुलगुलिया' जाति की तकदीर बदलने निकली एक लड़की, दामिनी सबर अपने इरादों से एक नई इबारत लिख रही है. पढ़िए एक हौंसले की कहानी  

BY -
Shivpujan Singh CR
Shivpujan Singh CR
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 19, 2026, 1:30:41 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK):- गुलगुलिया जनजाति की जिसे घुमुंतू भी बोला जाता है. दरअसल ये आपको घुमते हुए कभी स्टेशन ,बस स्टैंड या फिर किसी ऐसे जगह पर झोपड़ी बनाकर रहते हुए दिख जायेंगे, जिसे देखकर ही लगेगा कि इनकी माली हालत तो खराब है और साथ ही पढ़ाई-लिखाई से न तो कई वास्ता है और न ही अपने भविष्य की कोई फिक्र . इनका इतिहास ही ऐसा ही कि अलग-अलग इलाकों में घूमकर, भीख मांगकर रोजी-रोटी किसी तरह कमाते हैं और अपनी जिंदगी बेफिक्री में बसर करते हैं.

घुमंतू होता है खानबदोश गुलगुलिया समाज

ये लोग कभी आपको चिड़ियो और बगुलो का शिकार करते हुए भी मिल जायेंगे. कभी आपको पेड़ से शहद निकालते हुए भी दिखालाई पड़ेंगे. कभी ट्रेन में भीख मांगते , तो कोई छोटा-मोटा काम करते दिख जायेंगे. झारखंड के  आसपास इस जनजाति की संख्या आपको ज्यादा मिलेगी, धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर और रांची में भी इसकी अच्छी तादाद है

अक्सर इनका कोई स्थायी आशियाना तो नहीं होता. दरअसल, काफी पिछड़ा यह समुदाय कभी आगे बढ़ने की न सोचा औऱ न ही कोई हौसला औऱ हिम्मत ही दिखाया. नतीजा ये है कि आज भी इनकी जिदंगी मुफलिसी की चादर ओढ़े हुए हैं. जहां गुरबत ही इनका नसीब है और जैसे-तैसे जिंदगी की गाड़ी खींचना ही इनका मकसद दिखता है. लेकिन इस समुदाय की एक लड़की है दामिनी सबर जो इस जाति की शान बन गई है . उसने भी गरीबी देखी है, जिल्लत झेला और तानों की लंबी फेहरिश्त दिल में समायी हुई थी. लेकिन उसने वो रास्ता नहीं चुना जो उसके समुदाय के लोग दशकों से करते आ रहे हैं. बल्कि जिंदगी में कुछ करने की ठानी.  

कलम की बदौलत अपने समाज को बदलेगी एक लड़की

उसने पढने लिखने का मन बनाया और कलम-कॉपी को ही अपनी आगे की दुनिया मान ली . आज उसकी यह मेहनत ने ऐसा रंग दिखाया कि गुलगुलिया जाति की वह पहली लड़की है जो मैट्रिक और इंटर की परीक्षा पास की . वो भी फर्स्ट क्लॉस में . जी हां दामिनी सबर ने अपनी जिंदगी संवारने का संकल्प ले ली है. अपनी तकदीर खुद संवराने के लिए कलम को ही अपना सबकुछ मान लिया. इस समुदाय के लोगों की शादी तो कम उम्र में ही कर दी जाति है. दामिनी के साथ भी ऐसा ही होने वाला था, लेकिन उसने इससे साफ इंकार कर दिया था. लौहनगरी जमशेदपुर के चाकुलिया की रहने वाली दामिनी सबर झारखंड में खानाबदोश गुलगुलिया समाज की एक पहचान बन गई है. इसने अपने समुदाय का नाम रौशन 2023 में किया था. जब वह दसवी बोर्ड की परीक्ष प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की थी.

इसके बाद कुछ दिन पहले झारखंड एकेडिमक काउसिल की पांच जून को जारी आर्टस परीक्षा के रिजल्ट में 67 प्रतिशत अंकों लाकर फर्स्ट डीविजन में पासकर एकबार फिर अपना लौहा मनवाया. सुर्खियों में आकर दामिनी ने अपने खानबदोश गुलगुलिया जाति को एकबार फिर लाइमलाइट में ला दिया.

अभी भी चुनौतियों के पथ पर दामिनी

चुनौतियों के समर में दामिनी तो हर वक्त इम्तहान दे रही है. लेकिन उसका सपना प्रखंड विकास पदाधिकारी यानि बीडीओ बनने की है. अभी भी उसके लिए चुनौती ग्रेजुएशन करने की है , जहां पैसो की किल्लत तो है ही . इसके साथ जाति प्रमाण पत्र भी बनाना है. इसके चलते भी उसके लिए आगे की राह थोड़ी मुश्किल बन गई है. दामिनी ने कहा कि वह इतिहास या राजनीति शास्त्र विषय से स्नातक करना चाहती है. लेकिन जाति प्रमाण पत्र की अनिवार्यता के कारण कॉलेज में एडमिशन मुश्किल हो गया है. कार्यालयों के चक्कर काटने के बावजूद उसे खतियान, स्थायी पता या अन्य जरूरी दस्तावेज न होने की बात कहकर निराशा ही मिली है. उम्मीद है कि इस मुश्किलों को भी वह पार कर लेगी और आगे अपने सपनों की उड़ान भरेगी. फिलहाल दामिनी अपनी मां जसिन सबर और सात भाई-बहनों के साथ नगर पंचायत के पास झोपड़ी में रहती है. इंटर की पढ़ाई के लिए वह कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में रहकर पढ़ाई करती थी. लेकिन अब फिर स्नातक करने में बाधाएं खड़ी हो रही है.

दामिनी के पिता की बहुत पहले हो गई मौत

दामिनी सबर के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. उसके पास न कोई जमीन है और न ही कोई घर . वह जिस गुलगुलिया जाति से आती है. वह अंचल कार्यालय में सूचिबद्द भी नहीं है. ऐसे उसके लिए जाति प्रमाण पत्र बनाना मुश्किल हो गया है. दामिनी के पिता का देहांत बहुत पहले ही हो गया था, उसने मैट्रिक की परीक्षा पेड़ के नीचे तैयारी करके दी थी. पैसों की किल्लत हुई तो मजदूरी करके अपने परिवार को मदद की .

हालांकि, जिला प्रशासन ने दामिनी सबर को काफी मदद किया तब वह आज इस मुकाम तक पहुंची है. हालांकि, उसकी जिंदगी की कहानी बेहद ही दर्दनाक है. उसे 2021 में चाइल्डलाइन के प्रयास से आठवीं कक्षा में दाखिला मिला था. एक लापता बच्चे की तलाश के दौरान वह संपर्क में आई थी. बाद में उसका आधार कार्ड बना और केएनजे हाई स्कूल में उसका दाखिला हुआ और फिर वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखी

दामिनी किताब-कांपी के जरिए अपनी तकदीर तो बना ही रही है. इसके साथ ही उस खानबदोश गुलगुलिया समाज के लिए भी एक आशा कि किरण बनी हैं. आज जमाना चांद पर पहुंच गया है , सूचना क्रांति के इस युग में पलक झपके सारी जानकारी मोबाइल में आ जा रही है. हमारा देश दुनिया में चौथी अर्थव्यवस्था बन चुका है. लेकिन वही गुलगुलिया समुदाय आज भी अपने पुराने ही हालत में इधर-उधर भटकर जिंदगी काट रहा है. हालांकि, दामिनी ने अपने समुदाय को भी आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और उस समाज को एक पहचान देना चाहती है. जिसने शायद खुद को कभी पहचाना ही नहीं और सीधे-सीधे ये मान लिया है कि वह बाकियों से अलग है. उसके नसीब में ही दुख-दर्द और भटकना लिखा है.

 

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