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बाबूलाल का कांटा साफ, सरयू राय की वापसी! देखिये, रघुवर मुक्त भाजपा से सीएम हेमंत पर कैसे लटका खतरे की घंटी

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 8:52:55 PM

Ranchi-पूर्व सीएम रघुवर दास का झारखंड से विदाई के साथ ही तरह-तरह के सियासी आकलनों का दौर जारी है. इस बात की पड़ताल भी की जा रही है कि जिस रघुवर को झारखंड का पहला गैर आदिवासी सीएम बनाते वक्त भाजपा ने इसे अपना मास्टर स्ट्रोक बताया था. आज उसी रघुवर को झारखंड की सियासत से विदाई करने का हैरत अगेंज फैसला क्यों लेना पड़ा! चंद दिन पहले तक जिस रघुवर को 2024 के लोकसभा चुनाव में चतरा संसदीय सीट पर बैंटिंग के लिए उतारने की चर्चा की हो रही थी, अचानक से उसी रघुवर को झारखंड की सियायत से रुखस्त करते हुए ओड़िशा भेजने के पीछे कुछ तो मजबूरियां होगी.

झारखंड भाजपा में अभी और हो सकते हैं कई ऑपरेशन

जानकार बताते हैं कि इसके पीछे झारखंड भाजपा की अपनी सियासी मजबूरियां है. उपरी तौर पर भले ही सब कुछ शांत दिखे, और एक साथ समवेत रुप से पीएम मोदी का जयकारा सुनाई दे, लेकिन अन्दर की कहानी कुछ और ही है. झारखंड भाजपा का पूरा संगठन कई टोलियों में विभाजित है. दावा किया जाता है कि आज के दिन झारखंड भाजपा में एक ही साथ कई भाजपा काम कर रही हैं, नेताओं के बीच खिंचातानी का आलम यह है कि झारखंड की कमान संभाले हुए बाबूलाल को करीबन चार माह का समय गुजर गया, लेकिन बावजूद आज तक बाबूलाल के द्वारा अपनी टीम की घोषणा नहीं की गयी.

बाबूलाल की संकल्प यात्रा को भी फ्लॉप करवाने की रची जा रही थी साजिश

अपनी ताजपोशी के साथ बाबूलाल ने जिस जोशो ख़रोश के साथ अपनी संकल्प यात्रा की शुरुआत की, और उसके माध्यम से हेमंत सरकार की नाकामियों को सामने लाने का प्रयास किया, हेमंत सरकार के खिलाफ हमवलावर रुख अपनाया, भाजपा नेताओं के द्वारा उस संकल्प यात्रा का हवा भी निकालने की साजिश रची गयी, दावा किया जाता है कि जब उनकी यह संकल्प यात्रा जमशेदुपर पहुंची तो उनका स्वागत करने के लिए एक साजिश के तहत जमशेदपुर का सबसे छोटा मैदान चुना गया, और उस छोटे से मैदान का आधा हिस्सा में पंडाल लगाया गया, लेकिन मजेदार बात रही कि 1200 की क्षमता वाले उस मैदान पंडाल में उपस्थिति महज 500-800 लोगों की रही. बताया जाता है कि संकल्प यात्रा का यह हाल देख बाबूलाल को काफी निराशा हुई थी, उन्हे समझ में आ चुका था कि आगे की राह और भी मुश्किल होने वाली है.

बाबूलाल के लिए आगे का बैटिंग का रास्ता साफ

लेकिन अब जबकि केन्द्रीय भाजपा ने अप्रत्याशित रुप रघुवर दास को ओड़िशा का राज्यपाल बनाने का फैसला लिया है, माना जाता है कि बाबूलाल के सामने बहुत हद तक खुल कर बैटिंग करने रास्ता साफ हो गया है. हालांकि अभी भी राह में कई काटें मौजूद हैं. संगठन के अन्दर आज भी कई भाजपा सक्रिय है, आने वाले दिनों में बाबूलाल को उसका भी काट ढूंढ़ना होगा. और जैसे ही बाबूलाल के द्वारा अपने टीम की घोषणा की जायेगी, उसकी तस्वीर भी सामने आ जायेगी.

सरयू राय की हो सकती है वापसी

इसके साथ ही रघुवर दास की विदाई से इस बात के भी संकेत मिलने लगे हैं कि जल्द ही झारखंड भाजपा में पूर्व मंत्री सरयू राय की वापसी होने वाली है, यह वही सरयू राय हैं, जिन्होंने पूर्वी जमशेदपुर से अपने रघुवर दास को सीएम रहते पटकनी देकर सियासी भूचाल ला दिया था, दावा किया जाता है कि रघुवर दास को उन्ही के पिच पर पटकनी देनी की पूरी पटकथा सीएम हेमंत के द्वारा रची गयी थी. दोनों ही रघुवर दास को झारखंड के सियासी परिदृश्य से बाहर देखना चाहते थें. आखिर कार सरयू राय का वह सपना पूरा हुआ, और रघुवर दास को ओड़िशा भेज कर उनकी वापसी की पटकथा तैयार कर दी गयी.

सीएम हेमंत के लिए भी बजने लगी खतरे की घंटी 

लेकिन क्या इन पटकथाओं के आगे एक दूसरी पटकथा भी लिखी जा रही है, और क्या रघुवर को गर्वनर का ताज पहना कर हेमंत को बेधने की पूरी पटकथा लिख दी गयी है. दावा किया जाता है कि रघुवर को राज्यपाल बनाकर भाजपा ने उन्हे सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया है, संवैधानिक रुप से जब तक वह राज्यपाल के पद पर आसीन हैं, उनके उपर कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती, जांच एजेंसियां उन पर अपना हाथ नहीं डाल सकती.

दरअसल भाजपा के द्वारा सीएम हेमंत को घेरने के लिए जितने की सियासी तीर छोड़े गये हैं, भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है, साहिबगंज खनन घोटला से लेकर खूंटी का मनरेगा घोटाला में उनकी सहभागिता के दावे किये गये हैं, पूजा सिंघल से लेकर विशाल चौधरी को सामने रख कर जिस प्रकार हेमंत सोरेन को सियासी रुप से घेरने की रणनीति तैयार की गयी, वह सब कुछ भाजपा के हाथ से सिर्फ इसलिए निकलता चला गया, क्योंकि जैसे ही जांच की गाड़ी आगे बढ़ती है, घोटाले के केन्द्र में रघुवर दास खड़ा नजर आने लगते है. रघुवर शासन काल में हुए घोटालों की एक लम्बी फेहरिस्त है, टॉफी-टी शर्ट घोटाला से लेकर ना जाने कितने घोटलों में रघुवर का नाम उछलने लगता है. और यहीं से भाजपा का हाथ बंधता नजर आने लगता है. दावा किया जाता है कि रघुवर को सुरक्षा कवच प्रदान कर भाजपा अब इस खेल को सुरक्षित तरीके से खेलना चाहती है.

यहां बता दें कि  झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के रुप में रघुवर दास की ताजपोशी करते वक्त अधोषित रुप से भाजपा ने अपने इस कदम को झारखंड की सियासत का मास्टर कार्ड माना था, उसे इस बात का यकीन था कि झारखंड की दूसरी सभी ओबीसी जातियां रघुवर दास के नेतृत्व को सहज रुप से स्वीकार कर लेगी. और इस प्रकार इस राज्य की एक बड़ी आबादी जो गैर आदिवासियों की है, उसे अपना एक नेता मिल जायेगा, और इसके साथ ही झारखंड की सियासत में किसी ना किसी आदिवासी को सीएम बनाने की जो अधोषित परंपरा और सियासी प्रचलन रहा है, उससे मुक्ति भी मिल जायेगी.

साफ है कि भाजपा का यह कथित मास्टर कार्ड और किसी का नहीं खुद पीएम मोदी और अमित शाह की रणनीति का हिस्सा था. हालांकि इसके पीछे एक विशेष सामाजिक समीकरण भी थें, नहीं तो उस वक्त भी भाजपा में चेहरों की कोई कमी नहीं थी, और तो और ओबीसी जातियों में ही महतो समुदाय से आने वाले चेहरों पर भी दांव लगाया जा सकता था, लेकिन मुसीबत यह थी कि कुर्मी-महतो चेहरे उस सामाजिक समीकरण में फीट नहीं बैठे पा रहे थें.

सीएम की कुर्सी मिलते ही बदल गयी थी रघुवर दास की भाषा

ध्यान रहे कि सीएम के रुप में ताजपोशी के पहले तक रघुवर दास को झारखंड की सियासत में कोई बड़ा चेहरा नहीं माना जाता था, लेकिन जैसे ही सिर पर पीएम मोदी की कृपा दृष्टि और अमित शाह का आशीर्वाद मिला, उनकी गिनती झारखंड के सबसे कद्दावर नेताओं में की जाने लगी. लेकिन चुनावी समर में यह कृपा दृष्टि किसी काम का नहीं रहा. एक सीएम के रुप में वह सिर्फ अपनी पार्टी की नया ही नहीं डूबायें, बल्कि खुद जमशेदपुर पूर्व विधान सभा से अपनी सीट भी गंवा बैठें.

जिस रघुवर को बारुद-तोप समझ रही थी केन्द्रीय भाजपा, झारखंड के सियासी पिच पर वह ढेर होता गया

साफ था कि पिछले करीबन आठ वर्षों से जिस रघुवर को झारखंड भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के दवाब में बारुद-तोप मान कर ढो रही थी, उसकी सामाजिक पकड़ नदारद थी, साथ ही कई बार अपने हठीले स्वभाव और बड़बोले बयान से पार्टी के सामने मुसीबत खड़े करते नजर आ रहे थें.

आजसू से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला रघुवर का ही था

ध्यान रहे कि आजसू को किनारा कर अपने चुनावी समर में उतरने का फैसला रघुवर दास का ही था, जानकारों का मानना है कि सीएम की कुर्सी मिलते ही रघुवर दास की भाषा और कार्यशैली पूरी तरह बदल चुकी थी, उन्हे इस बात का बेहद गर्व था कि झारखंड की सियासत में सिर्फ उनके सिर पर ही पीएम मोदी का आशीर्वाद है, और धीरे-धीरे यह गर्व अंहकार की ओर भी बढ़ने लगा था. जिसकी अंतिम परिणति खुद अपने विधान सभा क्षेत्र में हार के साथ हुई. सीएम की कुर्सी पर रहते हुए भी वह अपने ही एक पूर्व सहयोगी और मंत्री सरयू राय के हाथों बूरी तरह पराजित हो गयें.  

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