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निशाने पर तीर! 2024 के पहले दिशोम गुरु ने उछाला बंगला और जनजातीय भाषाओं के सम्मान का मुद्दा

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 9:08:28 AM

 

Ranchi- लम्बे समय से अपनी अस्वस्थता से जुझ रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन 2024 की रणभेरी बजने के ठीक पहले एक बार फिर से सियासी मोर्चे पर सक्रिय होने का संकेत दिया है. उनके द्वारा केन्द्रीय रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिख कर रेलवे में जनजातीय भाषा सहित बांग्ला भाषा को सम्मान देने की मांग की गई है.

ध्यान रहे कि भाजपा संताल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठियों के सवाल को उछाल कर हिन्दू मतों का धुर्वीकरण की रणनीति तैयार कर रही है. वहीं शिबू सोरेन ने जनजातीय और बांग्ला भाषा के सम्मान को मुद्दा बनाकर जनजातीय समाज और बांग्लाभाषियों को अपने पक्ष में खड़ा करने का तीर छोड़ दिया है.

बंगला को सम्मान या बंगलाभाषी मतों का धुर्वीकरण की कोशिश

अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि झारखंड 1912 तक बंगाल का हिस्सा था, इसके बाद बिहार का गठन हुआ और एक लम्बी लड़ाई के बाद झारखंड राज्य अस्तित्व में आया. वर्ष 1908 में भारतीय रेलवे अस्तित्व में आया था. इसके बाद ही पूरे देश में रेलवे लाईन बिछाने की शुरुआत हुई थी. तब तात्कालीन बिहार के इस हिस्से में सभी रेल स्टेशन और हॉल्टों का नाम अंग्रेजी, हिन्दी, उड़िया और बांग्ला के साथ ही जनजातीय भाषाओं में लिखा जाता था.

बांग्लाभाषियों की भावनाओं का करे सम्मान करे केन्द्र सरकार

उन्होंने कहा कि संथाल परगना, मानभूम सिंहभूम, धालभूम, पंचपरगना, पाकुड़,  बड़हवा, जामताड़ा, मिहिजाम,  मधुपुर,  जसीडीह,  मैथन, कुमारधुबी. चिरकुण्डा,  कालुवधान,  धनबाद, गोमो, मूरी जैसे इलाकों में बंग्लाभाषियों की एक बड़ी निवास करती है. इनकी भावनाएं बंगला भाषा से जुड़ी हुई है, महज चंद वर्ष पूर्व तक इन इलाकों में स्टेशनों और हॉल्टों का नाम बांग्ला सहित विभिन्न जनजातीय भाषाओं में लिखा जाता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इन इलाकों से रेलवे के द्वारा बांग्ला और जनजातीय नामों को मिटाया जा रहा है. यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है.

बांग्लाभाषी भी झारखंड के मूलवासी

शिबू सोरने ने दावा कि आदिवासी मूलवासियों की तरह ही बांग्लाभाषी भी झारखंड के मूलवासी है, और पूरा झारखण्डी समाज इनके साथ खड़ा है. इन क्षेत्रो में बंगला और जनजातीय भाषाओं में लिखे गये स्टेशन और हॉल्टों के नाम को मिटाना इस समाज का अपमान है. रेलवे को इस मामले में तुरंत पहल करते हुए तत्काल इन क्षेत्रों में स्टेशनों का नाम  जनजातीय समाज और बंगला भाषा में लिखना अनिवार्य करना चाहिए.

शिबू सोरेन के पत्र के बाद तेज हुई सियासत

शिबू सोरेन के इस पत्र के बाद राज्य में सियासत तेज होती नजर आ रही है, जानकारों का दावा है कि भाजपा के द्वारा जिस तरह से बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उछाला जा रहा था, उसका जवाब शिबू सोरेन ने बांग्लाभाषियों को झारखंड का मूलवासी बता कर दे दिया है, यह भी धुर्वीकरण की काउंटर कोशिश है. शिबू सोरेन राजनीति के पुराने धुंरधंर है, उन्हे पता है कि कब कौन सी चाल चलनी है, यही कारण है कि जब 2024 के  महासंग्राम की रणभेरी बजने वाली है, दिशम गुरु ने बेहद शांत तरीके से अपना पाशा फेंक दिया. अब देखना होगा कि भाजपा इस तीर से घायल होती है, या बच निकलने का कोई जुगाड़ लगाती है.

Tags:Dishome GuruBengali and tribal languagesBJP's allegations on Bangladeshi infiltrationदिशोम गुरु शिबू सोरेनबांग्लाभाषी भी झारखंड के मूलवासीLetter to Union Railway Minister Ashwini Vaishnav

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