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जातीय जनगणना के बाद अब सीएम नीतीश का “भीम संवाद”, दलित-अतिपिछडों को राजनीतिक भागीदारी देने की कवायद शुरु

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 7:31:40 AM

Patna-जातीय जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने के बाद सीएम नीतीश कुमार एक और मास्टर स्ट्रोक की दिशा में बढ़ते नजर आने लगे हैं, इस बार उनके निशाने पर दलित और अतिपिछड़ी जातियां हैं, उनकी कोशिश 2024 के सियासी महाजंग में दलित अतिपिछड़ी जातियों को मजबूती के साथ अपने पाले में वापस लाने की है.

जदयू के कोर वोटरों पर लगी हुई है भाजपा की नजर

हालांकि पहले ही अतिपिछड़ी जातियों को जदयू का कोर वोटर माना जाता था, लेकिन हालिया दिनों में उसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा की छिटकता दिख रहा था, खास कर जिस प्रकार से भाजपा ने पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को दरकिनार कर नीतीश कैबिनेट में अपने कोटे से दो-दो अतिपिछड़ों को उपमुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था. माना जाता है कि यह पूरी कवायत जदयू के अतिपिछड़े जनाधार में सेंधमारी के इरादे से की गयी थी.

भीम संवाद भाजपा की इसी साजिश का जबाव

हालांकि तब सियासी मजबूरी के तहत सीएम नीतीश चप्पी साधे रहें, लेकिन भाजपा गठबंधन से अलग होने के बाद वह एक बार फिर से अपने कोर वोटरों को साधने की रणनीति में जुट चुके हैं.  और इसी रणनीति के तहतत पांच नवम्बर को पटना में भीम संवाद का आयोजन करने का फैसला किया गया है. इस संवाद को सफल बनाने के लिए जदयू के पूरी टीम सक्रिय हो चुकी है, गांव गांव रथों को रवाना कर दिया गया है. बिहार सरकार के मंत्री और दलित नेता अशोक कुमार चौधरी, सुनील कुमार और रत्नेश सदा को इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी गयी है.

दलित-अतिपिछड़े मिलाकर 55 फीसदी आबादी पर जदयू की नजर

ध्यान रहे कि जातीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार बिहार में दलितों की  आबादी 19.65 फीसदी तो अतिपिछड़ी जातियों की आबादी 36 फीसदी बतायी गयी है, और उसके बाद ही दलित पिछड़ी जातियों के द्वारा भागीदारी का सवाल खड़ा किया जाने लगा है, और यह सवाल सिर्फ जदयू में नहीं खड़ा हो रहा है, सबसे अधिक बवाल की स्थिति तो एनडीए खेमा में मचा है. जहां चिराग पासवान से लेकर जीतन राम मांझी लगातार सामाजिक राजनीतिक भागीदारी-हिस्सेदारी का सवाल उठा रहे हैं, इसी बीच में पूर्व सीएम जीतन राम मांझी का बंद कमरे में नीतीश के साथ मुलाकात की खबर भी आयी थी. हालांकि बाद में इस महज औपचारिक मुलाकात बताकर दबाने की कोशिश की गयी.

भीम संवाद के दौरान खींचा जा सकता है राजनीतिक सहभागिता खांचा

भीम संसद की प्रासंगिकता को सामने रखते हुए मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि "भीम संसद के पीछे का विचार समाज में समानता की दिशा में काम करना है, जो हमारी सरकार अपने नारे 'न्याय के साथ विकास' के साथ कर रही है। भीम संसद से पहले अपनी बातचीत में, हम राज्य भर में लोगों से मिल रहे हैं और उन्हें हमारे साथ हाथ मिलाने के लिए कह रहे हैं। हम अपनी नवंबर की बैठक को बड़ी सफलता बनाना चाहते हैं।''

अपने आंकड़ों से सहारे दलित अतिपिछड़ों को साधने की कवायद

साफ है कि इस भीम संसद के दौरान नीतीश सरकार दलित-अतिपिछड़ी जातियों के सामने अपने कार्यों का ब्योरा पेश करेगी और इस बात सामने लाने की कोशिश करेगी कि नीतीश सरकार ने इस जातियों की शैक्षणिक सामाजिक उत्थान के कौन कौन से योजना को संचालन किया और उसका कितना लाभ इन वर्गों को मिला, इसके साथ ही जातीय जनगणना के आंकडों के प्रकाशन के बाद उनकी राजनीतिक सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करने की भावी योजना की रुप रेखा पेश की जायेगी.  

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