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काल भैरव के दर्शन किए बिना नहीं मिलता इस ज्योतिर्लिंग की पूजा करने का फल, त्रिशूल की नोक पर बसी इस नगरी में स्वयं भगवान विष्णु ने की थी शिव की पूजा  

काल भैरव के दर्शन किए बिना नहीं मिलता इस ज्योतिर्लिंग की पूजा करने का फल, त्रिशूल की नोक पर बसी इस नगरी में स्वयं भगवान विष्णु ने की थी शिव की पूजा  

टीएनपी डेस्क : सावन के पवित्र महीने में अगर आप भगवान शिव के प्रमुख स्थानों का दर्शन करना चाहते हैं तो भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी आपके लिए सही है. यहां आपको भगवान शिव के साथ देवी शक्ति भी आशीर्वाद देंगी. देश के 12 ज्योतिलिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग भी यहीं स्थापित है. उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा नदी के पश्चिम घाट पर स्थित काशी विश्वनाथ को सातवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है. इस ज्योतिर्लिंग की बहुत मान्यता है. कहा जाता है कि, यहां सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव माता पार्वती के साथ भ्रमण करने आते हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि, काशी नगरी में ही भगवान विष्णु ने अपने आराध्य शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया था. इस आर्टिकल में पढिए बाबा विश्वनाथ की उत्पत्ति की कहानी. 

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी

सप्तपुरियों में शामिल वाराणसी का नाम वरुण और अस्सी नाम की दो नदियों के बहने के कारण पड़ा. यह दो नदियां आगे जाकर गंगा में मिल जाती हैं. कहते हैं कि, गंगा किनारे शिव की यह नगरी भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर बसी है, जहां उनके ज्योति का एक रूप विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है. यहां पर गंगा नदी के बहने से यह काशी नगरी पाप नाशनी भी कहलाती है. कहा जाता है जो भी भक्त विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं वे पाप मुक्त हो जाते हैं. मान्यता है कि, कैलाश पर वास करने के कारण माता पार्वती से विवाह के बाद भी भगवान शिव उन्हें कैलाश नहीं लेकर गए और माता पार्वती अपने पिता के घर ही रहती थीं. ऐसे में जब भगवान शिव माता पार्वती से मिलने आए तब माता ने भगवान शिव से उनके साथ जाने की इच्छा जताई. माता पावर्ती के साथ जाने की इच्छा पर भगवान शिव उन्हें काशी ले आयें और तब से भगवान शिव माता पावर्ती के साथ यहीं निवास करने लगे.

विष्णु की पुरी

पुराणों में बताया गया है कि, पहले काशी नगरी विष्णु पुरी कहलाती थी. यहां भगवान विष्णु के आनंदाश्रु गिरे थे, जिसे बिन्दु सरोवर बन गया था. जिसके बाद से श्री हरि यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए थे. लेकिन भगवान शिव को यह नगरी पसंद आ गई और उन्होंने भगवान शिव से यह नगरी अपने निवास स्थान के लिए मांग ली. तब से ही यहां भगवान शिव का वास हो गया.

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की मान्यता

काशी में ऐसी मान्यता है कि, काल भैरव का दर्शन करने के बाद ही विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना चाहिए. बिना काल भैरव के दर्शन के विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा अधूरी मानी जाती है. क्योंकि, काल भैरव इस नगरी के अंगरक्षक कहलाते हैं. वहीं, काशी को मोक्ष धाम भी कहा जाता है. क्योंकि, मोक्ष प्रदान करने वाले स्वयं शिव शंभू का इस नगरी में वास है. ऐसा भी कहा जाता है कि, कभी भी प्रलय आने पर काशी को कोई क्षति नहीं हुई और न कभी होगी क्योंकि, उससे पहले ही भगवान शिव काशी नगरी को अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं और काशी सुरक्षित हो जाती है.   

 

Disclaimer: इस आर्टिकल में लिखी गई सभी बातें पुराणों और ग्रंथों पर आधारित है.

Published at:01 Aug 2024 01:12 PM (IST)
Tags:kashi vishwanathkashi vishwanath mandirkashi vishwanath dhamkashi vishwanath templebanaras kashi vishwanathkashiकाशी विश्वनाथकाशी विश्वनाथ मंदिरकाशी विश्वनाथ धामबनारस काशी विश्वनाथकाशीvaranasivaranasi indiaghats of varanasivaranasi ghatsindia varanasisadhus varanasibanaras varanasivaranasi tourist placesvaranasi u.pvaranasi ghatvaranasi cityvaranasi swimवाराणसीवाराणसी भारतवाराणसी के घाटभारत वाराणसीसाधु वाराणसीबनारस वाराणसीवाराणसी पर्यटन स्थलवाराणसी उत्तर प्रदेशवाराणसी घाटवाराणसी शहरवाराणसी तैरनाlord shivauttar pradeshsawankashi templeganga riverविश्वनाथ ज्योतिर्लिंगVishwanath Jyotirlingaज्योतिर्लिंगjyotirlingajyotirlinga in india12 jyotirlingabanarasupबनारसउत्तर प्रदेशकाशी घाटगंगा घाटभारत में ज्योतिर्लिंग12 ज्योतिर्लिंग
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