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क्यों मनाया जाता है सरहुल, किसकी होती है पूजा और क्यों पहनी जाती है लाल पाढ़ की साड़ी, जानिए सरहुल का खास महत्व

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: March 21, 2026, 11:59:42 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड और आसपास के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सरहुल प्रकृति, संस्कृति और आस्था का अनूठा पर्व है. यह खासतौर पर मुंडा जनजाति, उरांव जनजाति और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक माना जाता है. सरहुल का अर्थ ही है ‘सरई (साल) के फूलों का उत्सव’, जो जंगल और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है.

सरहुल के दौरान मुख्य रूप से सिंगबोंगा (सूर्य देव) और धरती माता की पूजा की जाती है. आदिवासी मान्यता के अनुसार सिंगबोंगा सृष्टि के रचयिता हैं और उन्हीं की कृपा से धरती पर जीवन संभव है. इस दिन गांव के सरना स्थल (पवित्र उपवन) में पुजारी, जिन्हें ‘पाहन’ कहा जाता है, विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा में साल के फूल, जल, धान और हड़िया (स्थानीय पेय) चढ़ाया जाता है. यह पूजा प्रकृति के प्रति आभार और आने वाले समय में अच्छी फसल की कामना के लिए की जाती है.

इस पर्व की एक खास पहचान है महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली लाल पाढ़ की साड़ी. यह साड़ी सफेद रंग की होती है, जिसके किनारे लाल रंग से सजे होते हैं. लाल रंग को खुशी, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि सफेद रंग शांति और पवित्रता को दर्शाता है. इस पारंपरिक वेशभूषा के जरिए महिलाएं अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखती हैं. वहीं पुरुष भी पारंपरिक पोशाक पहनकर नृत्य और गीतों में हिस्सा लेते हैं.

सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामुदायिक जीवन का भी प्रतीक है. इस दौरान गांवों में सामूहिक नृत्य-गान, उत्सव और भोज का आयोजन होता है. लोग अपने रिश्तों को मजबूत करते हैं और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश देते हैं.   

फूलों की मान्यता
माना जाता है कि वसंत ऋतु और सरहुल के समाए पलाश के फूल खिलते हैं, जो बहुत ही सुंदर और आकर्षित दिखते हैं. इसलिए सभी महिलाएं इस दिन लाल और सफेद रंग की साड़ियां पहनती हैं और इस दिन का खूब आनंद लेती हैं. 

इस तरह सरहुल हमें यह सिखाता है कि प्रकृति ही जीवन का आधार है और उसकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है. यही कारण है कि यह पर्व आज भी अपनी परंपराओं और मान्यताओं के साथ पूरे उत्साह से मनाया जाता है.

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