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सावन में कौन होते हैं कांवरिया, इस माह भोले शंकर का क्यों किया जाता हैं जलाभिषेक, क्या है इसके पीछे की मान्यता

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 4:53:56 PM

टीएनपी डेस्क : सावन का पवित्र महिना 22 जुलाई से शुरू हो रहा है. कल पहली सोमवारी के व्रत पर लाखों शिव भक्त भोले बाबा पर कांवड़ से जल चढ़ाने के लिए बाबा धाम पहुचेंगे. शिव की नगरी बाबा धाम कल से शिव भक्तों के रंग में रंगने वाली है. बाबा धाम में कल से ढोल नगाड़ों क साथ चारों ओर शिव के जयकारों की गूंज होगी. दूर-दूर से शिव भक्त कांवड़ लेकर बाबा धाम में स्थित वैद्यनाथ शिवलिंग पर जल चढ़ाने व उनके दर्शन के लिए पहुंचेंगे. भगवान शिव का दर्शन करने और अपनी मनोकामनाओं को पुरा करने के लिए दूर दूर से शिव भक्त कांवड़ यात्रा करेंगे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सावन के इस पवित्र महीने में शिव भक्त भोले बाबा को मनाने के लिए कांवड़ ही क्यों उठाते हैं? कांवड़ से ही क्यों भगवान शिव पर जल चढ़ाया जाता है? आखिर कांवड़ की सावन के महीने में क्या मान्यता है? 

कांवड़ यात्रा का महत्व 

सावन का महिना भगवान भोलेनाथ का सबसे प्रिय महिना माना जाता है. ऐसा भी कहा जाता है कि जो भी शिव भक्त कांवड़ लेकर भोले बाबा के दरबार पर पहुंचता है, उसकी सारी मनोकामना भगवान शिव पूरी करते हैं. ऐसे में इस महीने में भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए कांवड़ यात्रा का अत्यधिक महत्व है. हिन्दू धर्म के अनुसार सावन में कांवड़ यात्रा करना बहुत पवित्र माना जाता है. कांवड़ उठाने वाले शिव भक्त बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं. साथ ही ऐसी मान्यता है कि शिवलिंग पर कांवड़ से जल चढ़ाने पर भक्तों को जीवन में कष्टों का सामना नहीं करना नहीं पड़ता है और तो और मृत्यु के बाद उन्हें मोक्ष की भी प्राप्ति होती है. क्योंकि, कांवड़ यात्रा के दौरान शिव भक्तों द्वारा की गई कठिनाई और तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं. 

परंपरा की शुरुआत कब से हुई 

देवताओं द्वारा चढ़ाया गया था जल : पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान विष निकलने पर विष का पान भगवान शिव द्वारा किया गया था. विषपान करने से भगवान शिव का गला नीला पड़ गया था और उन्हें तकलीफ में देख सभी देवताओं द्वारा उस दौरान भगवान शिव पर कई पवित्र नदियों के साथ गंगा का जल भी अर्पित किया गया था. जिसके बाद से ही सावन महीने में कांवड़ में गंगा जल भरकर कांवड़ यात्रा निकली जाती है. 

रावण ने की थी पहली यात्रा : वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि, समुद्र मंथन के दौरान विष निकलने पर भगवान शिव द्वारा विषपान करने से उन्हें तकलीफ होने लगी व नकारात्मक प्रभावों ने भी उन्हें घेरना शुरू कर दिया था. विष से होने वाली तकलीफ से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव के सबसे परम भक्त कहे जाने वाले रावण ने कांवड़ में जल भरकर ‘पुरा महादेव’ में भगवान के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था, जिसके बाद ही भगवान शिव को विष से होने वाले दुसप्रभावों से मुक्ति मिली थी. इसलिए तब से ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत की गई थी. 

भगवान परशुराम ने भी कांवड़ से चढ़ाया था जल : वहीं, अन्य कांवड़ यात्रा को लेकर अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं. कहा जाता है कि, सबसे पहले कांवड़ यात्रा भगवान परशुराम द्वारा कि गई थी. भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास बना ‘पुरा महादेव’ का जलाभिषेक किया था. तब से ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो गई थी.

श्रवण कुमार ने भी की थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत: वहीं, दूसरी कथा ये भी है कि, सबसे पहले कांवड़ यात्रा श्रवण कुमार ने की थी. अपने नेत्रहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के दौरान श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठा कर हरिद्वार में गंगा स्नान कराया था और वापसी के दौरान गंगाजल भी लेकर गए थे, तब से ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है.

कांवड़ यात्रा का नियम

कांवड़ यात्रा करने के लिए भी कुछ नियम हैं जो शिव भक्तों को मानना ही पड़ता है. जैसे कि -

  • भगवान शिव के जयकारे के साथ शुरू कांवड़ यात्रा पैदल की जानी चाहिए.
  • यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए.  
  • मांसाहार और तामसिक भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए.
  • यात्रा के दौरान अगर आप कहीं रुक कर विश्राम करते हैं तो कांवड़ को नीचे रखने से बचें. क्योंकि कांवड़ नीचे रखने से वह अशुद्ध हो जाता है.
  • कांवड़ में गंगाजल या किसी पवित्र नदी का ही जल भर कर शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए.
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