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बारहवां ज्योतिर्लिंग: सूर्य देवता करते हैं सर्वप्रथम इस ज्योतिर्लिंग की आराधना, 108 नहीं सिर्फ 101 बार परिक्रमा करने की है मान्यता

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 11:52:43 PM

टीएनपी डेस्क: भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थित है. इन 12 ज्योतिर्लिंगों की मान्यता अलग-अलग है. सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन मात्र से ही भक्तों के सारे पाप दूर हो जाते हैं. इन 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला गुजरात में सोमनाथ, दूसरा आंध्रप्रदेश में मल्लिकार्जुन, मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर, इंदौर में ओंकारेश्वर, उत्तराखंड के केदार में केदारेश्वर, महराष्ट्र के पुणे में भीमाशंकर, उत्तरप्रदेश के वाराणसी में विश्वेश्वर (विश्वनाथ), महाराष्ट्र के नासिक में त्र्यंबकेश्वर, झारखंड के देवघर वैद्यनाथ, गुजरात के द्वारका में नागेश्वर, तमिलनाडु के रामनाथपुरम में रामेश्वर और अंत में 12वां महाराष्ट्र के औरंगाबाद में घुष्मेश्वर (घृष्णेश्वर) शामिल है. अब तक आपने 11 ज्योतिर्लिंगों के बारे में जाना, आज इस आर्टिकल में पढिए 12वें ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के बारे में.

सरोवर के दर्शन किए बिना घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा अधूरी

महराष्ट्र के पुणे में भीमाशंकर, और नासिक में त्र्यंबकेश्वर के बाद महाराष्ट्र के ओरंगाबाद जिले में ही 12वां ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर भी स्थित है. औरंगाबाद के पास दौलताबाद क्षेत्र में स्थित इस घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. घृष्णेश्वर मंदिर में होने वाली शयन आरती की बहुत मान्यता है. कहा जाता है कि, पूरे दिन पृथ्वी का भ्रमण करने के बाद भगवान इसी मंदिर में विश्राम करने आते हैं. यहां 101 शिवलिंग बनाकर पूजा करने व 101 बार परिक्रमा करने की मान्यता है.  मंदिर के समीप एक सरोवर है, जिसे शिवालय सरोवर कहा जाता है. बिना इस सरोवर के दर्शन किए घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा अधूरी मानी जाती है. वहीं, पूर्वमुखी होने के कारण ऐसी मान्यता है की इस ज्योतिर्लिंग की सर्वप्रथम पूजा सूर्य देवता करते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि, सूर्योदय से पहले शिवालय सरोवर के दर्शन के बाद घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से निःसंतान को संतान सुख की प्राप्ति होती है. साथ ही भक्तों को सारे पापों से मुक्ति व सुख समृद्धि मिल जाती है.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कहानी

पुराणों के अनुसार, दक्षिण देश में स्थित देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहता था. ब्राह्मण की कोई संतान नहीं थी. वहीं, ज्योतिष-गणना करने के बाद ब्राह्मण को पता चल की उनकी पत्नी सुदेहा कभी मां नहीं बन सकती. यह बात जानने के बाद सुदेहा ने अपने पति सुधर्मा को उसकी छोटी बहन घुष्मा से विवाह करने को कहा. अपनी पत्नी की बात सुनने के बाद ब्राह्मण नहीं माने लेकिन अंत में अपनी पत्नी की जिद्द को मानते हुए उन्हें अपनी पत्नी की छोटी बहन से विवाह करना पड़ा. घुष्मा भगवान शिव की परम भक्त थी और प्रतिदिन वह 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा किया करती थी. घुष्मा पर भगवान शिव की कृपा हुई और उसने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया. हालांकि, अपनी बहन को हंसता खेलता ब्राह्मण की पहली पत्नी सुदेहा को ईर्ष्या होने लगी. ईर्ष्या में आकर उसने एक रात अपनी बहन घुष्मा की संतान की हत्या कर उसे उसी कुंड में फेंक दिया, जिसमें घुष्मा प्रतिदिन भगवान शिव के पार्थिव शिवलिंगों को बहाया करती थी. वहीं, जब सुबह घर में घुष्मा को अपने मृत पुत्र के बारे में पता चला तो उसने शिव की आराधना करनी शुरू कर दी.

भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने भक्त के पुत्र को किया जीवित

घुष्मा ने भगवान शिव पर अपनी आस्था बरकरार रखी और प्रतिदिन की तरह ही उस दिन भी भगवान शिव की 101 शिवलिंग बना कर पूजा में वापस लीन हो गई. वहीं, घुष्मा की भक्ति देख महादेव ने प्रसन्न होकर उसके पुत्र को दोबारा जीवित कर दिया. अपने पुत्र को वापस जीवित देख घुष्मा खुश हो गई और साथ ही उसने भगवान शिव से उसी स्थान पर विराजमान होने की प्रार्थना की. जिसके बाद भगवान शिव ने घुष्मा की प्रार्थना को स्वीकारते हुए उसे वरदान दिया कि उनका यह ज्योति रूप घुष्मा के नाम से ही जाना जाएगा. तब से ही भगवान शिव का यह बारहवां ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर के नाम से जाना जाने लगा. साथ ही घुष्मा द्वारा 101 शिवलिंग बना कर पूजा करने के कारण ही यहां 101 बार परिक्रमा की मान्यता बन गई.

 

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