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रांची का एक ऐसा मंदिर जहां महादेव से पहले की जाती है नाग देवता की पूजा, कई हजार साल पुरानी है नाग-नागिन की कहानी

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 8:29:22 PM

टीएनपी डेस्क : हिन्दू कैलंडर के अनुसार जुलाई महीने के 22 तारीख से सावन का पवित्र महीना शुरू होने वाला है. ऐसे में शिवालयों में शिव भक्तों की भीड़ देखने को मिलेगी. सावन के इस पवित्र महीने में सारे शिवालयों में भगवान शिव का फूलों से शृंगार कर उनकी विशेष पूजा अर्चना की जाएगी. इस दौरान श्रद्धालु राज्य के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में जाकर भगवान शिव को जल चढ़ाने के लिए जाएंगे. झारखंड के पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक है पहाड़ी मंदिर. रांची शहर के केंद्र में पहाड़ की चोटी पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर बहुत पुराना है. मंदिर के धार्मिक महत्व व भव्यता के कारण यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.

मंदिर की मान्यता

राजधानी रांची शहर के बीचों-बीच पहाड़ पर स्थित पहाड़ी मंदिर इसका इतिहास काफी सालों पुराना है. इस मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग की काफी मान्यता है. इस मंदिर में भगवान शिव के साथ नाग देवता की भी पूजा की जाती है. वहीं, पहाड़ी मंदिर में नाग देवता का स्थान 55 हजार साल पुराना है. कहा जाता है कि, पहले यहां नाग देवता की गुफा पर भगवान शिव विराजते थे. साथ ही पहले के समय में यहां पर साक्षात नाग नागिन के दर्शन भी हो जाते थे. इसलिए यहां नाग देवता की भी खास पूजा की जाती है. श्रद्धालु नाग गुफा में जाकर नाग देवता को भी दूध चढ़ा कर उनकी पूजा करते हैं. वहीं, ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से नाग देवता स्वयं भगवान शिव व भगवान विष्णु से भक्त के कुशलमंगल के लिए प्रार्थना करते हैं. वहीं, आदिवासी समाज पाहन सरना की विधि से इस मंदिर में पहले नाग देवता की पूजा करते हैं, जिसके बाद ही भगवान शिव की पूजा की जाती है. वहीं, ऐसा भी कहा जाता है कि सावन के महीने में शिवलिंग का दर्शन करना भी काफी शुभ होता है और सारी मनोकामनाएं भी पूरी होती है. ऐसे में सावन के पवित्र महीने में यहां हजारों और लाखों की संख्या में श्रद्धालु लगभग 468 सीढ़ियां चढ़कर अपनी अपनी मनोकामनाएं लेकर इस मंदिर में पहुंचते हैं.

मंदिर का इतिहास

350 फीट ऊंची पहाड़ी मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. बताया जाता है कि, पहाड़ी मंदिर का निर्माण 1905 के आसपास नागवंशी राजाओं ने करवाया था. वहीं, आजादी की लड़ाई के समय अंग्रेज यहां स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर चढ़ाते थे. इस मंदिर का नाम पहले तिरीबुरु था जिसे अंग्रेजों ने बदलकर 'हैंगिंग गैरी' कर दिया था. इसलिए स्वतंत्रता के बाद हर साल 15 अगस्त व 26 जनवरी को पहाड़ी मंदिर में झंडा भी फहराया जाता है. लगभग 26 एकड़ में फैले इस भू-भाग पर पहाड़ी बाबा का यह मंदिर पहाड़ी पर बहुत सुंदर है. मंदिर के प्रांगण से पहाड़ी के चारों ओर बिखरी हुई हरियाली की सुंदरता देख आप मंत्र मुग्ध हो जाएंगे. पहाड़ी मंदिर से पूरा रांची शहर अद्भुत दिखता है

कैसे पहुंचे

अगर आप पहाड़ी मंदिर आना चाहते हैं तो आप एयरप्लेन, ट्रेन या फिर सड़क मार्ग से भी यहां पहुँच सकते हैं. रांची रेलवे स्टेशन से पहाड़ी मंदिर की दूरी लगभग 5 किलोमीटर है तो वहीं, एयरपोर्ट से लगभग 7 किमी. पहाड़ी मंदिर तक पहुंचने के लिए स्थानीय परिवहन की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं.

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