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देश का एकमात्र ज्योतिर्लिंग जहां त्रिदेव का है वास, महर्षि के तप से गंगा गोदावरी बन हुई थी प्रकट, कालसर्प दोष से भी मिल जाती है मुक्ति

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 19, 2026, 12:21:26 AM

टीएनपी डेस्क : सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव प्रमुख स्थानों के दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. कहा जाता है कि हिन्दू धर्म के अनुसार चातुर्मास (व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के चार महीने) के आरंभ होते ही जगत के करताधरता भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं. ऐसे में इन चार महीनों के लिए भगवान शिव सृष्टि के पालनहार होते हैं. यह चातुर्मास सावन के पवित्र महिने से शुरू होता है. इसलिए ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भगवान शिव धरती का भ्रमण करते हैं. ऐसे में भगवान शिव के प्रमुख स्थानों के दर्शन और पूजा पाठ करने से भगवान शिव भक्तों से खुश रहते हैं. साथ ही सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का दर्शन और भी शुभ होता है. वहीं, इन 12 ज्योतिर्लिंगों में आठवां ज्योतिर्लिंग सबसे खास है. महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित भगवान शिव का त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा अद्भुत है. इस आर्टिकल में पढिए कि कैसे इस ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति हुई और इससे जुड़ी कहानी क्या है. 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

पुराणों के अनुसार,  सप्तर्षियों में से एक महर्षि गौतम अपनी पत्नी देवी अहिल्या के साथ ब्रह्मगिरी पर्वत पर रहते थे. लेकिन ब्रह्मगिरी पर्वत पर कई अन्य ऋषि ऐसे थे जो गौतम ऋषि से ईर्ष्या करते थे. ऐसे में ऋषियों ने महर्षि गौतम को नीचा दिखाने के लिए उन पर गौहत्या का पाप लगा दिया और कहा कि अगर गौहत्या के पाप के प्रायश्चित के लिए मां गंगा को ब्रह्मगिरी पर्वत पर लाना होगा. ऋषियों की बात सुन गौतम ऋषि ने भगवान शिव के शिवलिंग को स्थापित कर उनकी पूजा अर्चना शुरू कर दी. गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. भगवान शिव से गौतम ऋषि ने देवी गंगा को ब्रह्मगिरी पर्वत पर भेजने का वरदान मांगा. वहीं, देवी गंगा ने भगवान शिव से कहा कि, यदि उस स्थान पर भगवान शिव भी वास करेंगें तभी वह भी उस स्थान पर निवास करेंगी. जिसके बाद ही भगवान शिव ने यहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप लिया और यहां विराजित हो गए. भगवान शिव के विराजमान होने के बाद देवी गंगा भी वहां गौतमी नदी के नाम पर बहने लगी. गौतमी नदी को गोदावरी नदी से भी जाना जाता है.

त्रिदेव है यहां विराजित

त्र्यंबकेश्वर मंदिर केवल महादेव ही नहीं बल्कि ब्रह्मा, विष्णु भी विराजमान है. मंदिर के अंदर तीन छोटे छोटे शिवलिंग जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के नाम से पूजा जाता है. साथ ही त्रिदेवों के मुखोटे के रूप में रत्नों से जड़ा हुआ मुकुट भी स्थित है. जिसका दर्शन भक्त केवल सोमवार को ही कर सकते हैं. वहीं, मंदिर के पास स्थित तीन पर्वत है. जिसमें पहला ब्रह्मगिरी पर्वत जो भगवान शिव का रूप है, दूसरा नीलगिरी पर्वत जहां दत्तात्रेय गुरु  और नीलाम्बिका देवी का मंदिर है और तीसरे में गंगा द्वार जहां देवी गोदावरी यानी गंगा का मंदिर है.

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व

मान्यता है कि, जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या पितृदोष है वो अगर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा करते हैं तो उनके सारे दोष मीट जाते हैं. साथ ही यहां के दर्शन मात्र से ही भक्त पाप मुक्त हो जाते हैं. जब बृहस्पति सिंह राशि पर आते हैं, तब गौतमी नदी तट पर कुंभ का आयोजन किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि, इस समय गौतमी नदी तट पर देवगण और नदियों में श्रेष्ठ गंगाजी पधारती हैं. ऐसे में कोई भी भक्त यहां आकर पाप और दोष मुक्त हो जाते हैं. साथ ही भक्तों की मनोकामना भी पूर्ण होती है.

 

 

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