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कामना लिंग के साथ जुड़ा है सती का हृदय, जानें भगवान शिव के आशीर्वाद के बाद भी अपने साथ शिव को क्यों नहीं ले जा पाया रावण

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 12:23:33 AM

टीएनपी डेस्क : महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित आंठवें त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के बाद नौवें स्थान पर है झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम. सावन के पवित्र महीने में बैद्यनाथ धाम में केवल झारखंड ही नहीं बल्कि आस पास के राज्यों से भी शिव भक्त कांवड़ से भगवान शिव पर जल चढ़ाने आते हैं. बाबा बैद्यनाथ धाम में स्थापित ज्योतिर्लिंग को मनोकामना लिंग या कामना लिंग भी कहा जाता है. क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने वाले भक्तों कि मनोकामना पूर्ण हो जाती है. बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को रावण की अताह भक्ति का प्रतीक भी माना जाता है. साथ ही इस बैद्यनाथ धाम में भक्तों को शिव के साथ शक्ति का भी आशीर्वाद मिल जाता है. क्योंकि, यहां भगवान शिव के साथ माता सती भी विराजमान हैं. इस आर्टिकल में पढिए बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के उत्पत्ति की कहानी और इसकी महत्व.

रावण से जुड़ी है बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति

रावण भगवान शिव के परम भक्तों में से एक माना जाता है. रावण ने अपनी सोने की लंका में कई देवता, यक्ष और गंधर्वो को भी कैद कर रखा था. साथ ही तीनों लोकों में शासन करना चाहता था. ऐसे में अपनी शक्ति बढ़ाने और महादेव को अपनी लंका में लाने के लिए रावण हिमालय पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगा. तपस्या के दौरान रावण बारी बारी से अपने 9 सिरों को भगवान शिव के शिवलिंग पर चढ़ाने लगा. लेकिन जब रावण ने अपना 10वां सिर काटना चाहा तब वैसे ही भगवान शिव रावण के समक्ष प्रकट हो गए. रावण के इस कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण से वरदान मांगने को कहा. ऐसे में रावण ने भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने की इच्छा जाहीर की. रावण की इस बात पर भगवान शिव ने अपनी कामना लिंग रावण को वरदान के रूप में दे दी. लेकिन भगवान शिव ने रावण के सामने एक शर्त भी रख दी कि, अगर तुमने कहीं भी रास्ते पर इस शिवलिंग को रखा तो तुम दोबारा शिवलिंग नहीं उठा पाओगे और शिवलिंग के रूप में शिव वहीं विराजित हो जाएंगें. रावण ने भगवान शिव की शर्त को मनाते हुए लंका की तरफ बढ़ गया.

ऐसे पड़ा वैद्यनाथ धाम का नाम

ऐसे में रावण द्वारा भगवान शिव के कामना लिंग को ले जाते हुए देख सभी देवता चिंतित हो गए और इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास पहुंच गए. इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु ने अपनी एक लीला रची. उन्होंने वरुण देव को रावण के पेट में जाने का आदेश दे दिया. वरुण देव के रावण के पेट मे जाते ही रावण को लग़शनक लग गई. ऐसे में भगवान शिव के शर्त को याद करते हुए वह असमंजस में पड़ गया. लेकिन तभी भगवान विष्णु बैजू नाम के ग्वाले का रूप लेकर रावण के सामने आ गए. रावण ने जब बैजु ग्वाले को देखा तो उसने शिवलिंग ग्वाले को पकड़ा कर लघुशंका करने चला गया. ऐसे में ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु ने मौके का फायदा उठा कर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और भगवान शिव वहीं शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए. लघुशंका कर के आने के बाद रावण ने जब शिवलिंग को जमीन पर रखा देखा तो उसने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह शिवलिंग को उठाने में असमर्थ रहा. वहीं, सभी देवी देवताओं ने आकर कामना लिंग की पूजा की, जिसके बाद से ही इस जगह का नाम बैजू ग्वाले के नाम पर बैजनाथ धाम पड़ गया.

शक्तिपीठ भी है प्रसिद्ध

पुराणों में ऐसा कहा गया है कि, जब माता सती के पार्थव शरीर को भगवान शिव लेकर घूम रहे थे तब भगवान विष्णु ने माता के शरीर को अपने चक्र से 52 टुकड़ों में बांट दिया था. जिसके बाद माता के शरीर के हुए 52 टुकड़े भारत में अलग अलग जगहों पर गिर गए जिसे शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है. इन्हीं टुकड़ों में से एक माता सती का हृदय बैद्यनाथ धाम में ही गिरा था. इस वजह से यह शक्तिपीठ को लेकर भी काफी प्रसिद्ध है.

बैद्यनाथ धाम की महिमा

बैद्यनाथ धाम को लेकर ऐसी मान्यता है कि, जो भी भक्त यहां अपनी मनोकामना को लेकर आते हैं तो उनकी मनोकामना भगवान शिव पूरी करते हैं. साथ ही यहां भगवान शिव के साथ भक्तों को माता सती का आशीर्वाद भी मिल जाता है. ऐसा भी कहा गया है कि बैद्यनाथ धाम में आकर दर्शन और पूजा करने से निःसंतान को संतान की प्राप्ति का भी सुख मिलता है.

 

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