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कैसे दो भागों में विभाजित हुआ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, आज भी भगवान शिव के लिए यहां बिछाए जाते हैं चौपड़, जानिए क्या है रहस्य

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 5:27:58 PM

टीएनपी डेस्क : मध्य प्रदेश के उज्जैन महाकालेश्वर के बाद है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग. मध्य प्रदेश के इंदौर खंडवा क्षेत्र के मांधाता में और नर्मदा नदी के मध्य में ओंकार पर्वत पर स्थित ओंकारेश्वर देश का चौथा ज्योतिर्लिंग है. महाकालेश्वर के बाद ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग राज्य का दूसरा ज्योतिर्लिंग है. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने के बाद शिव भक्त ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने आते हैं. ओंकार पर्वत पर स्थित होने व ॐ आकार होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम ओंकारेश्वर रखा गया. कहा जाता है कि, भगवान ब्रह्मा के मुख से सबसे पहले ॐ शब्द का उच्चारण हुआ था, जिसके बाद से ही ॐ शब्द के साथ हर धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ शुरू किया जाता है. वहीं, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को लेकर कई कहानी प्रचलित है. साथ ही इसके कई रहस्य भी है. आज के इस आर्टिकल में पढ़े देश के चौथे ज्योतिर्लिंग के मान्यताओं और इसकी उत्पत्ति के बारे में.

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति

ओंकार पर्वत जिसे मांधाता या शिवपुरी पर्वत के नाम से भी जाना जाता है. पुराणों के अनुसार, इस पर्वत पर राजा मांधाता ने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न कर भगवान भोलेनाथ को ओंकार पर्वत पर विराजमान होने का वरदान मांगा. जिसके बाद राजा मांधाता के तप से प्रसन्न भगवान शिव इस पर्वत पर विराजमान हो गए और तब से ही यह पर्वत मंधाता पर्वत के नाम से भी जाना जाने लगा.

दो भागों में विभाजित है ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर मंदिर दो भागों में विभाजित है – एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर. इसके पीछे भी एक कहानी प्रचलित है. ग्रंथों में बताया गया है कि, एक बार गिरिराज विंध्य पर्वत पर ऋषि नारद मुनि घूमते-घूमते पहुंच गए. वहां गिरिराज विन्ध्याचल ने बड़े ही आदर-सम्मान के साथ ऋषि नारद मुनि का स्वागत किया. इस दौरान गिरिराज विन्ध्याचल ने कहा कि वह सर्वगुण सम्पन्न है, उसके पास किसी चीज की भी कमी नहीं है. ऋषि नारद मुनि को गिरिराज विन्ध्याचल की बातों में अंहकार भाव साफ नजर आ गया. ऐसे में उन्होनें गिरिराज विन्ध्याचल का अंहकार तोड़ने के लिए मेरु पर्वत की प्रशंसा कर दी. ऋषि नारद मुनि के मुख से मेरु पर्वत की प्रशंसा सुन गिरिराज विन्ध्याचल दुखी हो गया था. इसके बाद उसने भगवान शिव की आराधना करनी शुरू कर दी. मिट्टी का शिवलिंग बना वह भगवान शिव की कठिन तपस्या करने लगा. भोलेनाथ भी गिरिराज की तपस्या को देखकर प्रसन्न हो गए और उससे वरदान मांगने को कहा. विध्यांचल ने भगवान शिव से कार्य की सिद्धि करने वाली अभीष्ट बुद्धि का वरदान मंगा. इस दौरान देवतगण व ऋषिगण भी वहां पहुंच गए और सब ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को दो स्वरूपों में विभक्त कर दिया जाए. जिसके बाद ही ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभाजित हो गया. इसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर तो दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

ओंकारेश्वर मंदिर का रहस्य

ऐसा कहा जाता है कि, तीनों लोक का भ्रमण कर महादेव इस मंदिर में रात में आराम करने आते हैं. यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भोलेनाथ माता पार्वती के साथ चौसर पांसे खेलते हैं. इसलिए प्रतिदिन पुजारी द्वारा शयन आरती के बाद मंदिर के गर्भगृह में चौसर पांसे बिछाएं जाते हैं और फिर पट बंद कर दिए जाते हैं. साथ ही पट बंद होने के बाद गर्भगृह में किसी को भी जाने की अनुमति नहीं होती है. ऐसा भी कहा जाता है कि सुबह में सारे पांसे बिखरे या उलटे मलते हैं, जिसका रहस्य आज तक नहीं सुलझ पाया है.

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व

मान्यता है कि, सभी तीर्थों का दर्शन करने के बाद भक्तों द्वारा ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन व पूजा करने से सारे तीर्थ सफल माने जाते हैं. सभी तीर्थों का जल लाकर तीर्थ यात्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पर अर्पित करते हैं और अपने सारे तीर्थ को पूर्ण करते हैं. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से भक्त आध्यात्मिक शांति प्राप्त करता है.

 

Disclaimer: इस आर्टिकल में लिखी गई बातें ग्रंथों और पुराणों के अनुसार है, तथा इसे कई माध्यमों से लिया गया है.

 

 

 

 

 

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