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महाकालेश्वर....जहां काल को भी टाल देते हैं शिव, फिर राजा महाराजा समेत मंत्री भी क्यों रुकने से होते हैं भयभीत, जानिए इसके पीछे का रहस्य

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 2:23:44 AM

टीएनपी डेस्क : यूं तो भगवान शिव के कई नाम हैं. भारत में हर जगह भगवान शिव अलग अलग नामों से पूजे जाते हैं. कहीं भगवान शिव शंभू हैं तो कहीं भोलेनाथ तो कहीं नीलकंठ तो कहीं शिव शंकर. लेकिन महादेव का एक रूप महाकाल भी है. दुनिया के सृजन और विनाशकर्ता महादेव को ‘कालों का काल महाकाल’ भी कहा जाता है. लेकिन महादेव के इस रूप की पूजा सिर्फ मध्य प्रदेश के उज्जैन में ही की जाती है. उज्जैन में  महाकाल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रुप में पूजे जाते हैं. इस महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की मान्यता बहुचर्चित है. ऐसे में सावन के इस पवित्र महीने में अगर आप भी अपनी मनोकामना पूर्ण करना चाहते हैं तो इस महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना आपके लिए शुभ होगा. इस आर्टिकल में पढिए इस ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा और इसकी महिमा के बारे में.  

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

भारत में शिव के 12 ज्योतिर्लिंग हैं. मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर तीसरे ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात है. यह ज्योतिर्लिंग बाकी ज्योतिर्लिंगों से ज्यादा खास और सर्वोत्तम है. दक्षिण की ओर मुख होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग को दक्षिणमुखी भी कहा जाता है. यह देश का एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है. ऐसी मान्यता है कि इस दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग की पूजा करने से शिव भक्तों को मृत्यु के बाद यमराज द्वारा किए जाने वाले प्रताड़ना से मुक्ति मिल जाती है. क्योंकि, भगवान यमराज दक्षिण दिशा के स्वामी कहलाते हैं. इसके साथ ही यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जिसकी पूजा भस्म से की जाती है. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की भस्मारती को देखने के लिए दूर दूर से शिव भक्त यहां पहुंचते हैं. यह भस्मारती तड़के सुबह 4 बजे की जाती है. 

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति 

ग्रंथों में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के बारे में लिखा गया है कि, भगवान शिव को उज्जैन का अवंती नगर बहुत प्रिय था. अवंती नगर में ही एक ज्ञानी ब्राह्मण वेद प्रिय था, जो शिव का बड़ा भक्त भी था. वहीं, दूषण नाम का राक्षस रत्नमाल पर्वत पर रहता था, जिसे भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था. वरदान मिले होने के कारण दूषण राक्षस ने ब्राह्मणों को परेशान करना शुरू कर दिया. उसने ब्राह्मणों को पूजा पाठ न करने की चेतावनी भी दी, लेकिन ब्राह्मण नहीं माने. इस कारण राक्षस ने ब्राह्मणों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया. राक्षस से परेशान होकर वेद प्रिय ब्राह्मण ने ब्राह्मणों व नगरवासियों की रक्षा के लिए भगवान शिव का आह्वान करना शुरू कर दिया. ब्राह्मण की पुकार सुन भगवान शिव ने दूषण राक्षस को चेतावनी दी, लेकिन राक्षस पर इसका कोई असर नहीं हुआ. 

शिव की हुंकार मात्र से भस्म हुआ राक्षस

चेतावनी के बाद भी राक्षस द्वारा नगरवासियों पर हमला करने से भगवान शिव क्रोधित हो गए. क्रोधित भगवान शिव ने फिर महाकाल का रूप लिया. पुराणों में कहा गया है कि, राक्षस को मारने के लिए क्रोधित महादेव धरती फाड़कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए थे. जिसके बाद भगवान शिव के महाकाल रूप ने अपनी हुंकार मात्र से राक्षस को भस्म कर दिया था. जिसके बाद भगवान महाकाल ने राक्षस के भस्म से अपना शृंगार किया था. राक्षस से मुक्ति दिलाने के बाद ब्राह्मणों ने भगवान महाकाल को उज्जैन के अवंती नगर में ही विराजमान होने के लिए विनती की. ब्राह्मणों के इस निवेदन को स्वीकारते हुए भगवान शिव ने महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए. तब से ही भस्म आरती की परंपरा चली आ रही है.  

भस्म आरती से किया जाता है शृंगार 

उज्जैन के इस महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में ही केवल भस्मारती की जाती है. कहा जाता है कि, इस भस्मारती द्वारा भगवान महाकाल को जगाया जाता है. महाकाल को चढ़ाने के लिए पहले भस्म शमशान से लाया जाता था, लेकिन अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, पीपल, पलाश, शमी,  अमलतास, बड़ और बेर की लकड़िकयों को जलाकर निकलने वाले राख को कपड़े से छानकर भगवान के लिए भस्म तैयार किया जाता है. साथ ही यह भस्मारती केवल यहां के पुजारी करते हैं. इस आरती में शामिल महिलायें घूँघट में होती हैं, क्योंकि कहा जाता है कि, भस्मारती के दौरान महाकाल निराकार के रूप में होते हैं जिसे महिलाओं को देखने की अनुमति नहीं होती है. 

मंदिर का रहस्य

आज तक उज्जैन में राजा, मंत्री कोई भी यहां नहीं शासन कर पाया है. कहा जाता है कि, धरती का सृजन और विनाश करने वाले महाकाल से बड़ा कोई शासक नहीं है. महाकाल के रहते ऐसे में कोई भी उज्जैन में शासन नहीं कर सकता. ऐसे में यदि कोई भी यहां रात भर भी रुकता है तो वह अपराध का भागी हो जाता है, क्योंकि आज भी भगवान महाकाल यहां के राजा है.

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्व 

मान्यता है कि, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने से भक्त सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं. दक्षिणमुखी होने के कारण भक्त मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करते हैं. इतना ही नहीं, दर्शन मात्र से ही भक्तों को महाकाल धन धान्य, लंबी आयु व संतान प्राप्ति होती है. साथ ही महाकाल भक्तों को निरोग होने का वरदान भी देते हैं.

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