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शिक्षक दिवस: पिता चाहते थे पुजारी बनें, शिक्षा में थी रुचि और बन गए राष्ट्रपति राधाकृष्णन

BY -
Shahroz Quamar
Shahroz Quamar
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 6:08:21 PM

डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय, रांची:

तीन सजावत देश को,गुरु,सती और शूर।

तीन लजावत देश को,कपटी, कायर क्रूर।।

भारतवर्ष की पुण्य भूमि पर अनेक गुरुओं और संतों का पदार्पण होते रहा है, इनमें याग्वल्क्य, भारद्धाज, अष्टावक्र, वेदव्यास, शंकराचार्य, वशिष्ठ, विश्वमित्र, संदीपनी, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, यमदग्नि, परशुराम, रामकृष्ण परम हंस, विवेकानंद आदि मुख्य हैं, जिनके ज्ञान और विवेक से भारतवर्ष गौरान्वित हुआ है.  भारतवर्ष को सजाने संवारने वाले और विश्व  गुरु बनाने वाले शिक्षक, सती, संत और शूर हैं, जिनपर हमें नाज और ताज है.

भारतीय गुरुओं की इसी सुदीर्घ परंपरा में तमिलनाडु के तरुत्तनी ग्राम में 5 सितंबर 1888 को जिस नवजात शिशु ने जन्म लिया और अपने वैदुष्य और शिक्षकत्व धर्म से न केवल भारतवर्ष को अपितु संपूर्ण विश्व को प्रकाशित और गौरवान्वित किया, इतिहास उसे डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जानता है. पिता चाहते थे पुत्र पुजारी बने, लेकिन पुत्र की ख्वाहिश अंग्रेजी सीखने और शिक्षक बनने की थी. हरि इच्छा बलीयसी, जहाँ चाह-वहाँ राह की लोकोक्ति चरितार्थ हुई. मेधावी राधाकृष्णन ने क्रिश्चन कालेज मद्रास से दर्शन शास्त्र में एम.ए.की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और उसी कालेज में प्राध्यापक नियुक्त हो गए. वे अपनी प्रतिभा के बल पर निरंतर आगे बढ़ते गए.

कोलकाता विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र पढ़ाया

कुछ दिनों के बाद वे रेजिडेंसी कालेज मद्रास में प्राध्यापक बन गए. पुनः मैसूर और कोलकाता विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर बनाए गए. लंबी अवधि तक आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर रहे. पुन: आंध्र विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए।पं मदन मोहन मालवीय उन्हें आफर देकर अपने यहां ले आए. वे 1946 तक वहां के कुलपति रहे. वे अपने कुलपतित्व काल में प्रत्येक रविवार को विश्वविद्यालय परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर में प्रातः 8 से 10 बजे तक श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रवचन करते थे और उनके उद्बोधन को सुनने के लिए न केवल छात्र छात्राओं का अपितु शिक्षकों तथा अन्य श्रध्दालुओं की भीड़ लगी रहती थी. यह बात मैंने रांची के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डा के.के.सिंहा से सुनी थी, जो 1945-46 में बी.एच.यू वाराणसी के छात्र हुआ करते थे.

कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़ाव

उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा शिष्टमंडलों का सफल नेतृत्व किया. उन्होंने 1948-49 में यूनेस्को के एक्जीक्यूटिव बोर्ड के अध्यक्ष पद को गौरवान्वित किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद माना जाता है. डॉ. राधाकृष्णन 1949-1952 मे  स्वतंत्र भारत के रूस में राजदूत रहे. अपने राजदूतत्व काल में वे नियमित रूप से लेनिन पुस्तकालय अपने अध्ययन हेतु जाया करते थे. ज्ञान के प्रति उत्कृष्ट अभिलाषा ने उन्हें एक आदर्श शिक्षक बना दिया. आदर्श शिक्षक का यह एक महत्वपूर्ण गुण माना जाता है. 1952 से 1962 तक वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति रहे और 1962  से 1967 तक वे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने. 1962 में भारत चीन युद्ध और 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध उन्हीं के राष्ट्रपति त्व काल में लड़ा गया था. अपने ओजस्वी भाषणों से भारतीय सैनिकों के मनोबल को ऊचां उठाने में उनका योगदान सराहनीय था.

भारतीय दर्शन और संस्कृति पर उनके प्रमुख ग्रंथ

     1. एथिक्स आफ वेदांत(वेदांत की नैतिक भूमिका)

  1. दी फिलासफी आफ रवीन्द्र नाथ टैगोर(रवीन्द्र नाथ टैगोर का दर्शन)
  2. दी रेन आफ रिलीजन इन कंटेंपरेरी फिलासफी(सामयिक दर्शन के क्षेत्र में धर्म का प्रभाव)
  3. इंडियन फिलासफी(भारतीय दर्शन)
  4. दी फिलासफी आफ दी उपनिषद्स(उपनिषदों का दर्शन)

      6. भगवदगीता इस्ट एण्ड वेस्ट सम रिफ्लेक्शनस

  1. इ्स्टर्न रिलीजन एण्ड वेस्टर्न थौट्स।
  2. एन आडियलिस्टिक व्यू आफ लाइफ
  3. हिंदू व्यू आफ लाइफ

     10. भारतीय संस्कृति

भारत रत्न से किये गए सम्मानित

सत्य की खोज, संस्कृति तथा समाज डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन पर शिप्ली द्वारा संपादित एक पुस्तक प्रसिद्ध है. यह एक अभिनंदन ग्रंथ है, जिसमें भारतीय दर्शन और डॉ. राधाकृष्णन के अन्वेषणों पर अनेक विद्वानों के खोजपूर्ण लेख हैं. अपनी रचनात्मक एवम् दार्शनिक उपलब्धियों के कारण वे देश और विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों के द्वारा डाक्टरेट्स की मानद उपाधियों से नवाजे गए. डॉ. राधाकृष्णन को 1954 में स्वतंत्रता सेनानी सी.राजगोपालाचारी और भौतिक शास्त्री डॉ. सी.वी.रमण के साथ सबसे पहले भारत-रत्न के साथ सम्मानित किया गया था. डॉ.  राधाकृष्णन भाषण कला के आचार्य थे. विश्व के विभिन्न देशो में भारतीय तथा पाश्चात्य दर्शन पर भाषण देने के लिए उन्हें सम्मान पूर्वक बुलाया जाता था. श्रोता उनके भाषणों से मंत्र मुग्ध हो जाते थे. डॉ.  राधाकृष्णन में विचारों, कल्पना यथा भाषा द्वारा विचित्र ताना बाना बुनने की अद्भभुत क्षमता थी. वस्तुतः उनके प्रवचनों की वास्तविक महता उनके अंतर में निवास करती थी, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है. उनकी यही आध्यात्मिक शक्ति सबको प्रभावित करती थी, अपनी ओर आकर्षित करती थी और संकुचित क्षेत्र से उठाकर उन्मुक्त वातावरण में ले जाती थी.

उनकी हाज़िर जवाबी सुन निरुत्तर हो जाते लोग

हाजिर-जबाबी में वे गजब के थे. एक बार वे इग्लैंड गए. विश्व में उन्हें हिंदूत्व के परम विद्वान के रूप में जाना जाता था,तब देश परतंत्र था. बड़ी संख्या में लोग उनके भाषण को सुनने के लिए आए थे. भोजन के समय एक अंग्रेज ने राधाकृष्णन से पूछा-क्या हिंदू नाम का कोई समाज है? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो? तुम्हारा एक सा रंग नहीं,  कोई गोरा, कोई काला,कोई बौना, कोई धोती पहनता है, कोई लूंगी कोई कुर्ता तो कोई कमीज देखो. हम अंग्रेज सभी एक जैसे हैं, सब गोरे गोरे लाल लाल. इस पर डा. राधाकृष्णन ने तपाक से उत्तर दिया- घोड़े अलग अलग रंग रूप के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं. अलग अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं।अंग्रेज को काठ मार गया. मैं अपने पाठकों को बताना चाहता हूं कि जब उनके शिष्यों और शुभैषियों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जाहिर की, तो उन्होंने कहा मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए. वे चाहते तो अपना जन्मदिन राष्ट्रपति दिवस के रूप में मना सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उनकी दृष्टि में शिक्षक ही सर्वोपरि होता है. शिक्षक ही राष्ट्रपति बनाता है, अतः वह सर्वोतोभावेन संपूज्य है. सचमुच वे आदर्श शिक्षक के साक्षात् पर्याय थे. उन्हें जन्मदिन पर कोटिशः नमन,वंदन और अभिनंदन है.

 

ऐसे गुरुजनों के ज्ञान से भविष्य का भारत अपनी खोई समृद्धि और श्रेष्ठता को हस्तगत करेगा क्योंकि अब हम एक और नेक बन गए. शिक्षक दिवस के पावन पुनीत अवसर पर भविष्य के भारत के  सर्वागीण कल्याण और विकास के लिए परमपिता परमेश्वर से हमारी प्रार्थना है:-

सबकी नसों में पूर्वजों का पुण्य रक्त प्रवाह हो।

गुण, शील,साहस,बल तथा सबमें भरा उत्साह हो।

सबके हृदय में सर्वदा, संवेदना की दाह हो।

हमको तुम्हारी चाह हो,तुमको हमारी चाह हो।

(लेखक रांची में रहते हैं.  रा़ंची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रहे. कई किताबें प्रकाशित. संप्रति फिनलैंड प्रवास पर. स्‍वतंत्र लेखन.)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं. the News Post का सहमत होना जरूरी नहीं. हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं.

Tags:News

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