टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बंगाल में बहुत कुछ बदल रहा है. रेलवे स्टेशन की सूरत भी बदलने लगी है. यूनियन की राजनीति कमजोर पड़ने लगी है. बंगाल को जानने वाले सियालदह रेलवे स्टेशन और इसके महत्व को भी जानते होंगें. यहां कुल 21 प्लेटफार्म हैं. भाजपा सरकार बनने के बाद एक से 21 प्लेटफार्म तक को फेरीवालों से मुक्त करा दिया गया है. जानकारी के अनुसार सियालदह रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से लगभग ढाई सौ से अधिक फेरीवाले को हटा दिया गया है. रेलवे सूत्रों के अनुसार फेरीवालों को पहले नोटिस दिया गया. फिर समय दिया गया. उस दौरान उनमें से कई अपनी दुकानों या स्टॉल लेकर चले गए. प्लेटफॉर्म नहीं छोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की गई.
रोज लगभग 1500 ट्रेनों का भर उठता है यह स्टेशन
सियालदह रेलवे स्टेशन का महत्व आप इसी से समझ सकते हैं कि प्रतिदिन लगभग 900 ईएमयू यहाँ से चलती हैं. इसके अलावा इस स्टेशन से रोज लगभग 1500 ट्रेन गुजरती हैं. रेलवे तो पहले से चाह रहा था कि सियालदह स्टेशन को मुक्त करा दिया जाए, लेकिन संभव नहीं हो रहा था. पिछली सरकार में यूनियनों के दबाव के कारण फेरीवालों को हटाना संभव नहीं था. लेकिन सरकार बदलने के बाद सियालदह स्टेशन के प्लेटफार्म को फेरी वालों से पूरी तरह मुक्त करा दिया गया है. इस रेलवे स्टेशन का इतिहास बहुत पुराना है.
घोड़े से चलने वाली ट्राम की अवधारणा सियालदह से ही हुई थी शुरू
जानकारी के अनुसार 1857 में, कलकत्ता और उत्तरी और दक्षिणी बंगाल के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क मार्ग स्थापित करने के लिए पूर्वी बंगाल रेलवे की स्थापना की गई थी. उस समय की तुलना में, सियालदह एक अविकसित क्षेत्र था, जहाँ हर जगह कीचड़, दलदल और गड्ढे थे. कलकत्ता शहर के बीचोंबीच 60 मील लंबी रेल पटरी बिछाई गई और दक्षिण-पूर्वी रेलवे कंपनी का गठन हुआ था. इसने सियालदह को दमदम से सफलतापूर्वक जोड़ा गया.1862 में, स्टेशन 4 प्लेटफॉर्म के साथ अच्छी तरह से स्थापित हो गया था, तब से यह कोलकाता के सबसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों में से एक बन गया. धीरे-धीरे इसका और विकास हुआ और यह डायमंड हार्बर, कैनिंग, सिलीगुड़ी, असम और अन्य स्थानों से जुड़ गया. सन् 1978 से पहले ट्राम टर्मिनल सियालदह स्टेशन पर स्थित था, यहीं से घोड़े से चलने वाली ट्राम की अवधारणा शुरू हुई थी.