खरसावां गोली कांड: आज ही के दिन पुलिस के गोली से मारे गए थे आदिवासी,जानिए गोली कांड की पूरी कहानी 

    खरसावां गोली कांड: आज ही के दिन पुलिस के गोली से मारे गए थे आदिवासी,जानिए गोली कांड की पूरी कहानी

    रांची(RANCHI): झारखंड का खरसावां गोली कांड आज भी आदिवासी नरसंहार की कहानी को खुद में समेटे है. एक जनवरी को जब देश दुनिया नए साल का जश्न मना रहा होता है तब झारखंड के  खरसावां में मातम जैसा माहौल रहता है. यहां आज यानि एक जनवरी को कोई जश्न नहीं मनता बल्कि शहीद दिवस के रूप में उसी बाजार में कोने कोने से आदिवासी पहुंच कर उस वक्त की याद को ताज़ा करते है. कैसे पुलिस ने मशीन गन से गोली बरसाई थी और खरसावां की धरती आदिवासियों की खून से लाल हो गई थी.

    यह समय देश के आजादी के महज कुछ महीने बाद का था.देश आजाद होने के बाद सभी रियासत के किसी ना किसी राज्य के साथ विलय होने लगा. इसी में खरसावां रियासत का विलय ओडिसा के साथ होने की खबर सामने आई. कहा जाता है कि केंद्र सरकार ने इसके लिए दबाव बनाया.लेकिन खरसावां के लोग किसी राज्य के साथ मिलने को तैयार नहीं थे. आजादी के बाद से ही झारखंड को अलग राज्य की मांग उठ रही थी. वह किसी के साथ जाने को तैयार नहीं थे.

    बस केंद्र और ओडिसा सरकार के खिलाफ आदिवासी गोलबंद होना शुरू हुए. सभी ने आंदोलन की मशाल जला कर लड़ने की तैयारी कर ली. लेकिन जब सरकारों का दबाव बढ़ा तो फिर कई बार आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई. हर बार पुलिस की लाठी का शिकार आदिवासी बनते गए. लेकिन जब एक जनवरी 1948 का दिन आया. इस दिन किसी ने नहीं सोचा था की आंदोलन से कभी वापस नहीं लौटेंगे.  

               

    आज ही के दिन खरसावां बाजार हाट मैदान में आंदोलन के लिए आदिवासी जमा हुए. लेकिन इस आंदोलन को रोकने के लिए लाठी या आँसू गैस नहीं बल्कि मशीन गन के साथ खरसावां बाजार हाट में ओडिसा मिलिट्री को तैनात किया गया.और मशीन गन से ही एक लकीर खिची गई. जिसमें बताया गया की अगर इसे कोई आगे पार करता है तो फिर गोली चलेगी. आदिवासी कुछ समझ पाते तब तक गोलियों की आवाज गूंजी और आदिवासियों की लाश गिरने लगी.

    इस गोली कांड में कितने लोगों की जान गई. यह कहीं भी सटीक जिक्र नहीं है. लेकिन इसे राम मनोहर लोहिया के उस बयान से समझा जा सकता है. जिसमें उन्होंने खरसावां गोलीकांड को जालिया वाला बाग कांड 2 करार दिया था. जानकारों के मुताबिक हजारों लोगों की मौत का दावा किया गया है. लेकिन आज तक यह साफ नहीं है कि कितने आदिवासी गोली के शिकार हुए थे.

    खरसावां के लोग आज भी इस दिन को याद कर भावुक हो जाते है. एक जनवरी को हर साल शहीद स्थल पर मेले जैसा दृश्य रहता था. राज्य में मुख्यमंत्री से लेकर हर वह नेता जो आदिवासी और झारखंड की संस्कृति से जुड़ा है. इस शहीद स्थल पहुंच कर शहीदों को श्रद्धांजलि देता है. और अपने पूर्वजों के बलिदान को याद कर नमन करता है.

                

              

           


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