हिजाब विवाद के बीच निजी खर्चे पर मंदिर बनवा रहे श्रीकृष्ण भक्त नौशाद शेख, प्रतिमा का प्राण-प्रतिष्ठा कल

    हिजाब विवाद के बीच निजी खर्चे पर मंदिर बनवा रहे श्रीकृष्ण भक्त नौशाद शेख, प्रतिमा का प्राण-प्रतिष्ठा कल

    दुमका (DUMKA) -  आज हाईटेक युग में भी जिस तरह देश में धार्मिक कट्टरता तेजी से पांव फैला रहा है, इसका ताजा उदाहरण देश में हिजाब विवाद है. ऐसे माहौल में “मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना”. कहावत को दुमका के नौशाद शेख चरितार्थ करने में जुटे हैं.  गंगा जमुनी तहजीब का उदाहरण पेश कर रहे हैं.  मामला दुमका जिला के रानीश्वर प्रखंड के महिषबाथन गांव का है. जहां नौशाद शेख निजी खर्च पर महाभारत कालीन थीम पर भगवान कृष्ण का मंदिर बनवा रहे है. मंदिर का नाम श्री श्री पार्थ सारथी मंदिर है. बता दें कि 40 लाख रुपये के खर्च से बना मंदिर अब बन कर तैयार है और सोमवार 14 फरवरी को मंदिर में प्रतिमा स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन होगा.

    तीन साल पहले रखी गई थी मंदिर की आधारशिला   

    दरअसल शुरू से ही भगवान कृष्ण के प्रति महिषबाथन निवासी नौशाद शेख की आस्था रही है. महिषबाथन गांव में माघी पूर्णिमा के दिन पार्थ सारथी की पूजा होती है. मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा अर्चना की जाती है. वर्ष 2018 में नौशाद शेख पश्चिम बंगाल के मायापुर घूमने गए थे. रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण उनके स्वप्न में आये और कहा कि तुम मुझे कहां ढूंढ रहे हो, मैं तो तुम्हारे गांव में ही हूं. फिर क्या था, वहां से लौटकर नौशाद को पार्थ सारथी मंदिर बनाने का धुन सवार हो गया. वहीं 10 जनवरी 2019 को पार्थ सारथी मंदिर की आधारशिला रखी गई. लगभग 3 वर्ष में मंदिर बनकर तैयार हुआ और सोमवार यानी 14 फरवरी को मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा विधिवत किया जाएगा. सारी तैयारी पूरी हो गई है.

    सामाजिक एकता का प्रतीक

    मंदिर को भव्य रूप दिया गया है. महाभारत में अर्जुन के सारथी बने भगवान कृष्ण के रूप को दिखाया गया है. रथ पर बजरंगवली को भी सवार दिखाया गया है. इस बारे में मो नौशाद शेख कहते है कि यह मंदिर सामाजिक एकता का प्रतीक है. देश वासियों के लिए संदेश यही है कि ईश्वर एक हैं और एक ही रहेंगे. स्थानीय निवासी संगीता कहती है कि नौशाद शेख मुस्लिम होकर मंदिर बना रहे हैं, इससे खुशी की बात और क्या हो सकती है. सच ही कहा गया है “मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना”. काश मो नौशाद की तरह सोच रखने वालों के बदौलत ही भारत की गंगा जमुनी तहजीब आज भी जिंदा है.

    रिपोर्ट : पंचम झा, दुमका

     


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