पश्चिम बंगाल- हिन्दू मतदाताओं का भाजपा से मोह भंग! लेकिन कांग्रेस-लेफ्ट की बढ़ती पकड़ से ममता के माथे पर भी चिंता की लकीर

    पश्चिम बंगाल- हिन्दू मतदाताओं का भाजपा से मोह भंग! लेकिन कांग्रेस-लेफ्ट की बढ़ती पकड़ से ममता के माथे पर भी चिंता की लकीर

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK):  2014 लोकसभा चुनाव के साथ भाजपा ने जिस तेजी से पश्चिम बंगाल में अपना पैर पसारा था, अब उसकी वह तेजी मंद पड़ती दिख रही है, ताजा पंचायत चुनाव में उसे मत प्रतिशत 17 फीसदी की भारी गिरवाट दर्ज की गयी है, लोकसभा चुनाव में 40 फीसदी मत पाने  वाली भाजपा आज 23 फीसदी मत के साथ कांग्रेस और लेफ्ट के साथ खड़ी नजर आने लगी है. लेकिन बावजूद इसके ममता बनर्जी की मुसिबत कम होती नजर नहीं आ रही है, उसका कारण है लेप्ट-कांग्रेस का बढ़ता ग्राफ. खास कर टीएमसी का कोर मतदाता लेफ्ट कांग्रेस गठबंधन की ओर शिफ्ट होता नजर आने लगा है, यही कारण है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है.

    पंचायत चुनाव में टीएमसी ने गाड़ा अपनी कामयाबी का झंडा

    हालांकि पंचायत चुनाव में टीएमसी ने अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ा है, और मुख्य विपक्षी दल भाजपा को पीछे हटना पर मजबूर किया है, लेकिन टीएमसी कांग्रेस और लेफ्ट को नियंत्रित करने में वह असफल रही है. जहां टीएमसी ने जिला परिषद की 95 फीसदी सीटों और पंचायत समिति की 79 सीटों पर अपना कब्जा जमाया है, लेकिन अब तक शुन्य पर खड़ा नजर आ रहे कांग्रेस और लेफ्ट ने भी अच्छी सफलता उसे चौंका दिया. जानकारों का मानना है कि यदि यही ट्रेंड बरकरार रहा तो ममता बनर्जी के लिए भाजपा से ज्यादा परेशानी कांग्रेस के बढ़ते ग्राफ से होने वाली है. पार्टी की मुख्य चिंता अल्पसंख्यक मतदाताओं एक हिस्से में कांग्रेस के प्रति बढ़ती नजदीकियां हैं.

    लोक सभा की 18 सीटों को बरकरार रखना ही भाजपा की बड़ी चुनौती

    लेकिन जहां तक भाजपा का सवाल है कि वोट प्रतिशत में यह गिरावट उसके लिए चिंता का विषय है. अभी उसके पास 18 लोकसभा की सीटे हैं. उसकी मुख्य चुनौती इन सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखना है. दावा किया जा रहा है कि भाजपा के गिरते मत प्रतिशत की मुख्य वजह हिन्दू मतदाताओं के एक हिस्से में कांग्रेस और लेफ्ट के प्रति बढ़ता अनुराग है, भाजपा अपने तमाम उग्र हिन्दूत्व की छवि के बावजूद हिन्दू मतदातओं को अपने साथ बांधे रखने में असफल हो रही है. खास कर आदिवासी, गोरखा, राजवंशी और कुर्मी मतदाताओँ ने भाजपा से दूरी बनाने की शुरुआत कर दी है. राज्य में भाजपा की छवि आदिवासी गोरखा विरोधी के रुप में बनती जा रही है, इधर कुर्मी मतदाताओं की मुख्य मांग अपने को ट्राइबल घोषित करवाने की है, इसी आशा और विश्वास के साथ उनका भाजपा के साथ जुड़ाव हुआ था, लेकिन जिस प्रकार प्रदेश भाजपा में उलटफेर मचा रहा, टीएमसी छोड़ कर भाजपा में आये नेताओं के द्वारा घर वापसी की होड़ शुरु हुई, उनका भाजपा पर विश्वास डिगने लगा. इस तबके की नजर अब कांग्रेस की ओर है. और यह स्थिति भाजपा के साथ ही टीएमसी को मुसीबत में डालने वाली है.      


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