देश के इन दो राज्यों में छठ के बाद मनाई जाती है 'बूढ़ी' दिवाली, पढे अनोखी परंपरा का इतिहास

    देश के इन दो राज्यों में छठ के बाद मनाई जाती है 'बूढ़ी' दिवाली, पढे अनोखी परंपरा का इतिहास

    टीएनपी डेस्कTNP DESK):20 अक्टूबर को धूमधाम के साथ देश के साथ-साथ विदेशो में भी दीपोत्सव यानी दिवाली मनाई गई.लेकिन आपको हैरानी होगी कि हमारे देश में कुछ राज्य ऐसे हैं जहां छठ के 1 महीने बाद दिवाली मनाई जाती है.जिसे बूढ़ी दिवाली के नाम से जाना जाता है.चलिए जान लेते है वह राज्य कौन से है जहा यह अनोखी परंपरा निभाई जाती है और इसके पीछे का इतिहास क्या है.

    उत्तराखंड और हिमाचल में फॉलो की जाती है परंपरा

    हमारा देश भारत विविधताओ का देश है जहां हर धर्म, मजहब और जाति के लोग रहते है. यहां की परंपराएं भी अजीबोगरीब और विचित्र है.कुछ तो ज्यादा ही अजीबोगरीब होती है, जिसे सुनकर लोग हैरान रह जाते है, जिसमे से एक ये भी परंपरा है कि देश के दो राज्यों में दिवाली छठ के बाद मनायी जाती है.आपको सुनकर हैरानी होगी लेकिन ये सच है.चलिए जान लेते हैं आखिर , इसके पीछे का रहस्य क्या है.आपको बताये कि हिमालयी प्रदेशों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में दिवाली महीनेभर बाद मनाई जाएगी.जिसे स्थानीय लोग बूढ़ी दिवाली कहते है.

    सामान्य से बहुत अलग ही है यह दिवाली

    आपको बता दें कि बूढ़ी दिवाली सामान्य दिवाली से बहुत अलग है.जिसमे रस्साकशी, मशाल जुलूस और अन्य पारंपरिक रिवाज शामिल है.उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्सों में 11 दिन बाद भी दिवाली मनाई जाएगी.लोग इसे बग्वाल कहते है.उत्तराखंड के जौनसार बावर और हिमाचल के कुल्लू में दिवाली नवंबर के दूसरे या तीसरे सप्ताह में मनाई जाती है.

    पढ़े इसके पीछे का इतिहास

    आपको बताएं कि दिवाली भगवान राम के वनवास खत्म होने के बाद अयोध्या वापस आने की खुशी में मनाई गई थी जिसको आज भी लोग फॉलो करते है.हिमाचल और उत्तराखंड कुछ जगहें पर भी दिवाली का उत्सव राम के वनवास खत्म होने और वापस आने की खुशी में ही मनायी जाती है.पुरानी मान्यताएं के अनुसार इन राज्य में भगवान राम के वनवास से अयोध्या वापस आने की खबर 1 महीने बाद मिली थी. यही वजह है कि यहां के लोग दिवाली एक महीने देरी से मनाते है.

    पटाखों की जगह जलाई जाती है  लकड़ी की मसाल

    जौनसार बावर में बूढ़ी दीपावली कई दिनों तक मनाई जाती है. जहां पटाखों की जगह भीमल की लकड़ी की मशालें जलाई जाती है.इस दौरान लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में एक जगह पर एकट्ठा होते है.जहा ढोल-दमाऊ की थाप पर रासो, तांदी, झैंता, हारुल जैसे पारंपरिक नृत्य किया जाता है.जौनसार बावर कृषि प्रधान क्षेत्र है, इसलिए फसल कटाई के बाद लोग इस त्योहार को मनाने की परंपरा रखते है.


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